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सीने में चुभन, तेज़ दर्द या धड़कनें? हो सकता है पेरिकार्डाइटिस — जानें लक्षण, जाँच और इलाज

हमारा हृदय (Heart) दिन-रात, लगभग हर मिनट में 70 बार, यानी दिन में एक लाख से ज़्यादा बार धड़कता रहता है । इतनी मेहनत करने वाले इस नाज़ुक अंग की सुरक्षा के लिए प्रकृति ने एक विशेष परत बनाई है — पेरिकार्डियम (Pericardium)। यह एक पतली, दोहरी झिल्ली (double-layered membrane) है, जो दिल को चारों ओर से एक थैली की तरह ढकती है।
इस झिल्ली के भीतर थोड़ी-सी मात्रा में तरल पदार्थ होता है, जिसे पेरिकार्डियल फ्लूइड (Pericardial Fluid) कहा जाता है। यह तरल दिल की धड़कनों के समय दोनों परतों के बीच टकराव (friction) को कम करता है, जिससे हृदय सुचारू रूप से धड़कता रहता है। यह दिल का “सुरक्षात्मक कवच” है, जो उसे बाहरी झटकों, संक्रमणों और अत्यधिक फैलाव से बचाता है।
पेरिकार्डाइटिस क्या होता है?
पेरिकार्डाइटिस दिल को घेरे पतली झिल्ली (पेरिकार्डियम) की सूजन है। कभी-कभी किसी संक्रमण, चोट, या अन्य कारणों से इस झिल्ली में सूजन आ जाती है। जब ऐसा होता है, तो झिल्ली की दोनों परतें आपस में रगड़ खाती हैं और तरल पदार्थ बढ़ने लगता है, जिससे छाती में तेज़ दर्द, सांस लेने में कठिनाई, और धड़कन तेज़ महसूस होना जैसे लक्षण दिखाई देते हैं।
यह स्थिति हल्की भी हो सकती है और कभी-कभी गंभीर रूप भी ले सकती है, इसलिए इसके लक्षणों को समझना और समय पर चिकित्सकीय सलाह लेना बेहद जरूरी है।
पेरिकार्डाइटिस के प्रकार क्या है?
पेरिकार्डाइटिस कई अलग-अलग रूपों में प्रकट हो सकता है, और इनके प्रकार को समझना सही निदान व उपचार के लिए महत्वपूर्ण है।
1. एक्यूट पेरिकार्डाइटिस (Acute): अचानक शुरू होता है, कुछ दिनों या हफ्तों में ठीक हो सकता है।
2. सब-एक्यूट पेरिकार्डाइटिस (Subacute): धीरे-धीरे विकसित होता है, लक्षण कुछ दिनों में उभरते हैं।
3. रिकरेंट पेरिकार्डाइटिस (Recurrent): एक बार ठीक होने के बाद 4–6 सप्ताह या उससे अधिक समय बाद फिर लौट आता है।
4. क्रॉनिक पेरिकार्डाइटिस (Chronic): जब सूजन 3 महीने से ज़्यादा समय तक बनी रहती है या बार-बार लौटती रहती है।
5. कन्स्ट्रिक्टिव पेरिकार्डाइटिस (Constrictive): परिकार्डियम की परतें मोटी और कठोर हो जाती हैं, जिससे दिल के फैलने-सिकुड़ने की क्षमता घट जाती है। यह दुर्लभ लेकिन गंभीर रूप है।
अधिकांश मामले एक्यूट और स्वतः ठीक हो जाते हैं, लेकिन क्रॉनिक और कन्स्ट्रिक्टिव रूप लंबे उपचार की मांग करते हैं।
आपातकाल कब मानें?
नीचे दिए हालात जानलेवा हो सकते हैं—तुरंत इमरजेंसी में जाएँ:
● कार्डियक टैम्पोनेड के संकेत: तेज़ सांस फूलना, बहुत कमज़ोरी, बेहोशी-सी, रक्तचाप गिरना, दिल की धड़कन तेज़ होना, धुंधली/मद्धम हृदय-ध्वनि।
● शक़ी प्यूरीलेंट (पस भरा) पेरिकार्डाइटिस: तेज़ बुखार, कंपकंपी, सेप्सिस के लक्षण—इनमें तत्काल परिकार्डियोसेंटेसिस (तरल निकासी) की ज़रूरत पड़ सकती है।
लक्षणों की पहचान क्यों ज़रूरी है?
पेरिकार्डाइटिस के लक्षण अक्सर दिल के दर्द या हार्ट अटैक जैसे लग सकते हैं, इसलिए इन्हें समझना बेहद ज़रूरी है। यह बीमारी धीरे-धीरे शुरू हो सकती है या अचानक तेज़ दर्द के साथ प्रकट हो सकती है। नीचे दिए गए संकेत और लक्षण शरीर की वह चेतावनी हैं, जिनसे आप समय रहते पहचान कर उपचार करा सकते हैं।
🔸प्रमुख लक्षण
• तीखा, चुभता, सांस लेने/खांसने/लेटने पर बढ़ने वाला छाती का दर्द; बैठने या आगे झुकने से राहत मिलना विशिष्ट संकेत है।
• गर्दन, कंधे, पीठ या ट्रेपेज़ियस मांसपेशियों तक दर्द का फैलना।
• डॉक्टर को कभी-कभी परिकार्डियल फ्रिक्शन रब सुनाई देता है (सक्रैची/चीं-चीं जैसी आवाज़)।
🔸 अन्य लक्षण
पेरिकार्डाइटिस में मुख्य लक्षणों के साथ कई अतिरिक्त संकेत भी दिखाई दे सकते हैं, जिन्हें पहचानना समय पर उपचार के लिए बेहद ज़रूरी होता है।
● सूखी खाँसी
● धड़कनों का तेज़ या अनियमित महसूस होना (palpitations)
● बुखार और शरीर में दर्द
● थकान, कमजोरी
● चक्कर या बेहोशी
● सांस फूलना, विशेषकर लेटने पर
● कभी-कभी हिचकी या आवाज़ में बदलाव
ऐसे संकेतों को हल्के में न लें और ज़रूरत होने पर तुरंत चिकित्सा सलाह लें।
पेरिकार्डाइटिस होने के क्या कारण है ?
पेरिकार्डाइटिस सिर्फ एक सूजन नहीं है; यह कई तरह की छिपी हुई बीमारियों, संक्रमणों या शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली में गड़बड़ी का संकेत भी हो सकता है। कई बार यह बिना किसी स्पष्ट कारण के अचानक उभर आता है, इसलिए पेरिकार्डाइटिस के संभावित कारणों को समझना समय पर सही इलाज और जटिलताओं से बचाव के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।
1. संक्रमण कारण (इन्फेक्शन)
● वायरल संक्रमण: सबसे आम — जैसे कोक्ससाकी वायरस, इन्फ्लुएंज़ा, एचआईवी, या एडेनोवायरस।
● बैक्टीरियल संक्रमण: ट्यूबरक्युलोसिस (टीबी) प्रमुख कारण; अन्य बैक्टीरिया जैसे स्टेफाइलोकोकस या न्यूमोकोकस।
● फंगल संक्रमण: कमजोर रोग-प्रतिरोधक क्षमता वाले लोगों में।
● पैरासिटिक संक्रमण: बहुत दुर्लभ (जैसे एकोनोकॉकस)।
2. गैर-संक्रामक कारण (नॉन-इन्फेक्शन)
● ऑटोइम्यून बीमारियाँ: लूपस, रुमेटॉइड आर्थराइटिस, स्जोग्रेन सिंड्रोम, वास्कुलाइटिस आदि।
● दिल का दौरा (मायोकार्डियल इन्फार्क्शन): हार्ट अटैक के बाद कुछ दिनों या हफ्तों में सूजन।
● कैंसर: फेफड़ों, स्तन या लिंफोमा का फैलाव पेरिकार्डियम तक।
● थायरॉयड की कमी (हाइपोथायरायडिज्म) और किडनी फेल्योर (यूरीमिया)।
● रेडिएशन थेरेपी: कैंसर उपचार के बाद झिल्ली को नुकसान।
● दवाओं से: कुछ हृदय, मिर्गी, या रक्त पतला करने वाली दवाएँ (जैसे हाइड्रालाज़िन, फेनीटोइन, वारफारिन)।
● छाती की चोट या ओपन-हार्ट सर्जरी के बाद।
कौन लोग ज़्यादा जोखिम में हैं?
कुछ लोग पेरिकार्डाइटिस के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं। यदि आप नीचे दिए गए जोखिम-कारकों में आते हैं, तो आपको इस बीमारी का खतरा अपेक्षाकृत अधिक हो सकता है:
● पुरुष — महिलाओं की तुलना में लगभग 2 गुना अधिक जोखिम
● 20 से 50 वर्ष की उम्र — इस आयु वर्ग में अधिक आम
● हाल का वायरल संक्रमण — जैसे सर्दी, फ्लू या अन्य वायरल बीमारियाँ
● पहले पेरिकार्डाइटिस हो चुका हो — पुनरावृत्ति (दुबारा होने) की संभावना बढ़ जाती है
● कमजोर प्रतिरोधक क्षमता (इम्युनिटी) - जैसे डायबिटीज़, कैंसर या उसकी थेरेपी, HIV संक्रमण स्टेरॉयड या इम्यूनोसप्रेसिव दवाएँ लेने वाले मरीज
क्यों पेरिकार्डाइटिस को हल्के में नहीं लेना चाहिए?
पेरिकार्डाइटिस अधिकतर मामलों में अपने आप ठीक हो सकता है, लेकिन कुछ स्थितियों में यह गंभीर रूप धारण कर लेता है और दिल के कार्य को सीधे प्रभावित कर सकता है। यदि सूजन समय पर नियंत्रित न हो या कारण गंभीर हो, तो नीचे दी गई जटिलताएँ विकसित हो सकती हैं, जिनमें से कुछ जानलेवा भी हो सकती हैं। इसलिए इसके लक्षणों को पहचानना और सही इलाज लेना बेहद महत्वपूर्ण है।
1. पेरिकार्डियल इफ्यूज़न (झिल्ली के बीच तरल की मात्रा बढ़ना) - यह दिल के आसपास दबाव बढ़ा सकता है और सांस फूलने जैसी समस्याएँ उत्पन्न कर सकता है।
2. कार्डियक टैम्पोनेड - जब तरल इतनी मात्रा में जमा हो जाए कि वह दिल को दबा दे, तो यह स्थिति जीवन-घातक हो जाती है। इसमें रक्तचाप गिरना, बेहोशी, और गंभीर सांस की समस्या हो सकती है। यह एक मेडिकल इमरजेंसी है।
3.कन्स्ट्रिक्टिव पेरिकार्डाइटिस में लंबे समय तक सूजन रहने पर झिल्ली कठोर और मोटी हो जाती है। इससे दिल के फैलने-सिकुड़ने की क्षमता कम हो जाती है, जिसके कारण पैर सूजना, सांस फूलना, और थकान जैसे लक्षण लगातार बने रह सकते हैं।
4. रिकारेंस (रेकर्रेंट पेरिकार्डिटिस): कई मरीजों में पेरिकार्डाइटिस बार-बार लौट आता है। सही इलाज के बावजूद यह महीनों या वर्षों में दोबारा हो सकता है, खासकर यदि कारण ऑटोइम्यून या वायरल हो।
इन जटिलताओं को समय पर पहचानकर और उचित इलाज लेकर रोकना संभव है। इसलिए पेरिकार्डाइटिस को कभी नज़रअंदाज़ न करें — दिल की सुरक्षा में सावधानी ही सबसे बड़ी सुरक्षा है।
डॉक्टर कैसे पहचानते हैं? (डायग्नोसिस)
डॉक्टर मरीज की इतिहास, शारीरिक जांच और कुछ विशेष परीक्षणों से निदान करते हैं।
1.फिजिकल एक्ज़ाम: दिल की धड़कन पर एक “फ्रिक्शन रब”(रगड़ की आवाज़) सुनाई देती है।
2. इमेजिंग और लैब टेस्ट:
● ईसीजी (ECG): ST सेगमेंट का उठना, PR डिप्रेशन — विशिष्ट संकेत।
● एचोकर्दिओग्रफ (Echocardiography): झिल्ली में तरल या हृदय की गति का आकलन।
● छाती का एक्सरे: बड़ा इफ्यूज़न हो तो छाती की चौड़ाई बढ़ी दिख सकती है।
● सीटी / एमआरआई: जटिल मामलों में सूजन या कन्स्ट्रिक्शन का पता लगाने के लिए।
● रक्त जाँच: सीबीसी, ईएसआर/सीआरपी, ट्रोपोनिन (हार्ट मसल डैमेज का संकेत), थायरॉयड, किडनी फंक्शन, ब्लड कल्चर (पस के संदेह में)
● परिकार्डियल फ्लूइड टेस्ट: बैक्टीरिया या कैंसर कोशिकाओं की जांच हेतु।
● बायोप्सी या कार्डियक कैथेटराइजेशन: कन्स्ट्रिक्टिव पेरिकार्डाइटिस के संदेह में।
पेरिकार्डाइटिस का इलाज और उद्देश्य क्या है?
पेरिकार्डाइटिस के इलाज का उद्देश्य दर्द और सूजन कम करना, और जटिलताओं को रोकना होता है।
1. जीवनशैली और आराम
● जब तक दर्द और सूजन कम न हों, शारीरिक गतिविधि सीमित रखें।
● खिलाड़ी 3 महीने तक खेलों से दूर रहें।
● पर्याप्त आराम, तनाव-नियंत्रण और हार्ट-हेल्दी डाइट (कम नमक, ज्यादा फल-सब्जियाँ) रखें।
2. दवाएँ
● NSAIDs (इबुप्रोफेन, एस्पिरिन): दर्द और सूजन कम करने के लिए।
● कोल्चिसीन (Colchicine): सूजन घटाने और रोग के दोबारा लौटने की संभावना कम करने के लिए।
● कॉर्टिकोस्टेरॉइड्स (जैसे प्रेडनिसोलोन): जब NSAIDs न चलें या ऑटोइम्यून कारण हो — सीमित और धीरे-धीरे टेपर किया जाता है।
● एंटीबायोटिक/एंटीवायरल: संक्रमण के कारणों में।
● IL-1 ब्लॉकर (जैसे रीलोनासेप्ट/अनाकिनरा): बार-बार लौटने वाले (recurrent) मामलों में, विशेष अनुमति और निगरानी में।
3. प्रोसीजर और सर्जरी
● पेरिकार्डियोसेंटेसिस (Pericardiocentesis): जब दिल पर दबाव डालने वाला तरल जमा हो, तो सुई से तरल निकाला जाता है।
● पेरिकार्डियेक्टॉमी (Pericardiectomy) : गंभीर या कन्स्ट्रिक्टिव मामलों में झिल्ली का हिस्सा हटाना पड़ सकता है|
किन्हें अस्पताल में भर्ती होने की आवश्यकता पड़ सकती है?
पेरिकार्डाइटिस के अधिकतर मरीजों का इलाज दवाओं और आराम से घर पर ही हो जाता है। लेकिन कुछ स्थितियाँ ऐसी होती हैं जहाँ मरीज को हॉस्पिटल में भर्ती करना अत्यंत आवश्यक हो जाता है—क्योंकि ये परिस्थितियाँ बीमारी के गंभीर रूप, जटिलताओं या संभावित खतरे की ओर संकेत करती हैं। ऐसी स्थिति में देरी गंभीर परिणाम दे सकती है। नीचे वे प्रमुख कारण दिए गए हैं जब मरीज को अस्पताल में तुरंत भर्ती कर इलाज शुरू करना चाहिए।
1.तेज़ बुखार (100.4 °F से अधिक): उच्च बुखार गंभीर संक्रमण (जैसे टीबी या बैक्टीरियल पेरिकार्डाइटिस) का संकेत हो सकता है, जिसे बिना अस्पताल उपचार के संभालना मुश्किल होता है।
2. सब-एक्यूट शुरुआत: यदि बीमारी धीरे-धीरे कई दिनों में बढ़े, तो यह अधिक जटिल कारणों—जैसे टीबी, ऑटोइम्यून रोग—की ओर संकेत कर सकती है और विस्तृत जांच आवश्यक होती है।
3. बड़ा पेरिकार्डियल इफ्यूज़न: दिल के आसपास द्रव अधिक जमा होने से दिल पर दबाव बढ़ सकता है। यह स्थिति कभी-कभी तेजी से खराब होती है और अस्पताल में निरंतर निगरानी जरूरी होती है।
4. कार्डियक टैम्पोनेड का संदेह: जब द्रव दिल को दबाने लगे, तो यह जानलेवा स्थिति बन जाती है। इसमें सांस फूलना, रक्तचाप गिरना, बेहोशी और अत्यधिक कमजोरी हो सकती है। यह एक मेडिकल इमरजेंसी है।
5. NSAIDs लेने पर 7 दिन में सुधार न होना: यदि सामान्य दवाओं से सुधार न हो, तो इसका मतलब हो सकता है कि रोग का कारण गहरा या अधिक गंभीर है (जैसे टीबी, ऑटोइम्यून, या ड्रग-रिलेटेड)।
6. कमजोर प्रतिरोधक क्षमता (इम्मुनोसप्प्रेशन): जैसे—कैंसर के मरीज, स्टेरॉयड पर रहने वाले, HIV, या प्रतिरक्षा कमज़ोर करने वाली दवाएँ लेने वाले। इन मरीजों में संक्रमण जल्दी बढ़ सकता है, इसलिए अस्पताल उपचार ज़रूरी है।
7. छाती की चोट या हाल की सर्जरी: चोट या ओपन-हार्ट सर्जरी के बाद होने वाला पेरिकार्डाइटिस गंभीर रूप ले सकता है और निगरानी की आवश्यकता होती है।
8. एंटीकोआगुलेंट (खून पतला करने वाली दवा) चल रही हो: खून पतला होने की वजह से पेरिकार्डियल इफ्यूज़न में खून भरने (हेमो-परिकार्डियम) का खतरा बढ़ता है, जो जानलेवा हो सकता है।
9. ट्रोपोनिन बढ़ना (मायोकार्डिटिस का संकेत): यदि खून में ट्रोपोनिन बढ़ा हुआ मिले, तो इसका मतलब है कि दिल की मांसपेशी भी प्रभावित है (मायो-पेरिकार्डाइटिस)। इसके लिए अस्पताल में विशेष निगरानी और उपचार आवश्यक है।
पेरिकार्डाइटिस के कुछ गंभीर रूप ऐसे होते हैं, जिनमें मरीज की स्थिति तेजी से बिगड़ सकती है और तुरंत विशेषज्ञ देखभाल की आवश्यकता होती है। खासकर जब दिल पर दबाव बढ़ जाए या रक्तचाप अस्थिर होने लगे, तो सामान्य वार्ड में उपचार सुरक्षित नहीं होता। ऐसे हालात में मरीज को ICU में निरंतर निगरानी और त्वरित हस्तक्षेप की जरूरत पड़ती है।
पेरिकार्डाइटिस सामान्य भी हो सकता है और गंभीर भी—यह पूरी तरह इस बात पर निर्भर करता है कि समय पर लक्षण पहचाने गए या नहीं। यदि ऊपर बताए गए किसी भी संकेत में आप या आपके परिचित फिट होते हैं, तो अस्पताल में भर्ती होना जीवन रक्षक सिद्ध हो सकता है।
फॉलो-अप और निगरानी
पेरिकार्डाइटिस का उपचार सिर्फ दवाएँ लेने तक सीमित नहीं होता—यह एक ऐसी स्थिति है जिसमें सही फॉलो-अप, नियमित जाँच, और दवाओं का सावधानीपूर्वक उपयोग बेहद महत्वपूर्ण है। इलाज के बाद भी दिल की रिकवरी का मूल्यांकन करना आवश्यक है, ताकि जटिलताओं, दोबारा होने (रिकरेंस), या कन्स्ट्रिक्टिव पेरिकार्डाइटिस जैसी समस्याओं को समय रहते पहचाना जा सके।
● CRP/ECG/इको से सुधार की पुष्टि।
● पोस्ट-कार्डियक-इंजरी सिंड्रोम में 6–12 माह पर इको फॉलो-अप से कन्स्ट्रिक्टिव प्रगति की जाँच।
● दवाओं का धीरे-धीरे टेपर, अचानक बंद न करें (रिकरेंस का जोखिम)।
आगे क्या उम्मीद की जाए (प्रोग्नोसिस)?
यह जानना जरूरी है कि पेरिकार्डाइटिस का परिणाम उसके कारण और उपचार की समयबद्धता पर काफी निर्भर करता है।
- ज़्यादातर वायरल या बिना ज्ञात कारण (इडियोपैथिक) वाले मामलों में बीमारी कुछ हफ्तों में खुद ठीक हो जाती है और भविष्य भी आमतौर पर अच्छा रहता है।
- अगर कोल्चिसीन दवा न ली जाए तो लगभग 15–30% मरीजों में बीमारी दोबारा लौट सकती है। कोल्चिसीन लेने से दोबारा होने का खतरा लगभग आधा हो जाता है।
- बीमारी की गंभीरता उसके कारण पर निर्भर करती है. वायरल/इडियोपैथिक मामलों में आगे चलकर कोई बड़ी समस्या होने की संभावना बहुत कम होती है। टीबी या बैक्टीरिया से होने वाले (प्यूरुलेंट) मामलों में जटिलताएँ ज्यादा देखने को मिलती हैं।
- अगर प्यूरुलेंट पेरिकार्डाइटिस का इलाज समय पर न हो तो स्थिति जानलेवा हो सकती है। लेकिन समय रहते द्रव निकालने और उचित एंटीबायोटिक देने से नतीजे काफी बेहतर हो जाते हैं।
घर पर क्या सावधानियाँ रखें?
पेरिकार्डाइटिस का अधिकांश उपचार घर पर ही किया जा सकता है, लेकिन यह तभी सुरक्षित होता है जब आप डॉक्टर द्वारा दी गई सलाह का पूरी सख्ती से पालन करें। घर पर की गई देखभाल आपकी रिकवरी तेज़ कर सकती है, दर्द और सूजन को कम कर सकती है, और बीमारी के दुबारा लौटने (रिकरेंस) के जोखिम को काफी हद तक कम कर सकती है। कुछ सावधानियाँ आपकी स्वस्थ होने की प्रक्रिया को और भी सुरक्षित और प्रभावी बनाती हैं:
● तीखे छाती-दर्द को हल्के में न लें
● डॉक्टर के कहे अनुसार आराम, दवा-समय पर, और फॉलो-अप टेस्ट कराएँ।
● शराब/धूम्रपान, बेतरतीब ओवर-द-काउंटर दर्दनिवारकों से बचें।
● जिन लोगों को टीबी का ज़्यादा खतरा हो, या जिन्हें कैंसर, ऑटोइम्यून बीमारी या डायलिसिस चल रहा हो — अगर अचानक नया सीने में दर्द या बुखार शुरू हो जाए, तो बिना देर किए डॉक्टर को दिखाएँ।
समय पर पहचान और सही देखभाल ही सबसे बड़ी सुरक्षा
पेरिकार्डाइटिस आम तौर पर एक नियंत्रित और उपचार योग्य स्थिति है, बशर्ते इसके शुरुआती संकेतों को समय पर पहचाना जाए और उचित जाँच व इलाज कराया जाए।
हालाँकि, कुछ जटिल रूप—जैसे कार्डियक टैम्पोनेड या प्यूरुलेंट पेरिकार्डाइटिस—तेजी से जानलेवा बन सकते हैं और तत्काल अस्पताल उपचार की आवश्यकता होती है।
इसलिए यदि छाती का दर्द बैठने या आगे झुकने से कम हो रहा हो, बुखार बना रहे, सांस फूल रही हो, धड़कन तेज़ हो, चक्कर आए या बेहोशी महसूस हो—तो इसे मामूली समझने की गलती न करें। तत्काल जाँच और विशेषज्ञ परामर्श ही जटिलताओं से बचाव का सबसे सुरक्षित रास्ता है।
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Dr Prem Aggarwal, (MD Medicine, DNB Cardiology) is a Cardiologist by profession and also the Co-founder of Medical Dialogues. He is the Chairman of Sanjeevan Hospital in Central Delhi and also serving as the member of Delhi Medical Council

