भारत में मोटापे का 'अजीब विरोधाभास', इलाज तो चाहते हैं भारतीय, पर नहीं जानते इसके जानलेवा खतरे
वैश्विक मार्केट रिसर्च कंपनी इप्सोस (Ipsos) ने एक चौंकाने वाली रिपोर्ट जारी की है.
वर्ल्ड ओबेसिटी डे 2026 के मौके पर वैश्विक मार्केट रिसर्च कंपनी इप्सोस (Ipsos) ने एक चौंकाने वाली रिपोर्ट जारी की है. सर्वे के अनुसार, मोटापे से जूझ रहे भारतीय, दुनिया के अन्य देशों के मुकाबले वजन घटाने के लिए डॉक्टरों की सलाह लेने और समाधान खोजने में कहीं ज्यादा सक्रिय हैं. लेकिन इसी सक्रियता के बीच एक गंभीर "मोटापे का विरोधाभास" (Obesity Paradox) भी सामने आया है.
मोटापे का भारतीय विरोधाभास
सर्वे में पाया गया कि भारतीय लोग मोटापे को कम करने के लिए कोशिश तो कर रहे हैं, लेकिन इसके पीछे की वजह स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता कम और आत्म-ग्लानि (Self-blame) व सामाजिक कलंक (Stigma) का डर ज्यादा है. इप्सोस के विशेषज्ञों के अनुसार, भारत में लोग मोटापे को एक "बीमारी" के बजाय एक "व्यक्तिगत विफलता" के रूप में देखते हैं. वे सामाजिक दबाव में वजन तो घटाना चाहते हैं, लेकिन वे यह नहीं जानते कि मोटापा उनके शरीर को अंदर से कितना नुकसान पहुंचा रहा है.
वैश्विक औसत से आगे हैं भारतीय
इप्सोस ने 14 देशों के 14,500 वयस्कों पर सर्वे किया, जिसमें भारत के 2,000 लोग शामिल थे. भारत में मोटापे से ग्रस्त 50% लोगों ने पिछले एक साल में डॉक्टर से परामर्श लिया, जबकि वैश्विक स्तर पर यह औसत केवल 35% है. वजन घटाने के लिए शॉर्टकट या 'फैट डाइट' अपनाने में भी भारतीय आगे हैं. जहां दुनिया भर में 33% लोग इसे आजमाते हैं, वहीं भारत में 53% लोग ऐसे डाइट प्लान का सहारा लेते हैं. दिलचस्प बात यह है कि भारतीय लोग मोटापे के लिए आनुवंशिकी (Genetics) को जिम्मेदार मानते हैं, जो मेडिकल उपचार के प्रति उनकी सकारात्मकता को दर्शाता है.
जानकारी का बड़ा अभाव, जानलेवा बीमारियों से अनजान
सक्रियता के बावजूद, भारतीय यह नहीं जानते कि मोटापा किन गंभीर बीमारियों को जन्म देता है. केवल 37% भारतीयों ने मोटापे को डायबिटीज का मुख्य कारण माना, जबकि वैश्विक स्तर पर 53% लोग इस खतरे से वाकिफ हैं. केवल 39% भारतीयों को लगता है कि मोटापा दिल की बीमारी का कारण बन सकता है, जबकि दुनिया भर में 52% लोग इस खतरे को जानते हैं.
एक्सपर्ट की राय, नजरिया बदलने की जरूरत
इप्सोस हेल्थकेयर इंडिया की प्रमुख गौरी पाठक और रॉबर्टो कोर्टिस का मानना है कि मोटापे को एक 'कॉस्मेटिक' समस्या के बजाय एक "जटिल पुरानी बीमारी" के रूप में देखने की जरूरत है. वर्ल्ड ओबेसिटी डे का उद्देश्य शिक्षा के माध्यम से इस धारणा को बदलना है ताकि लोग केवल सामाजिक दबाव में नहीं, बल्कि स्वस्थ रहने के लिए सही उपचार चुनें.