बांग्लादेश में गहराता हेल्थकेयर संकट, औद्योगिक प्रदूषण बड़ी वजह
बांग्लादेश में स्वास्थ्य संकट गहराता जा रहा है, जिसमें औद्योगिक प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन की अहम भूमिका सामने आ रही है।
बांग्लादेश इस समय गंभीर स्वास्थ्य संकट की ओर बढ़ता नजर आ रहा है, जिसमें औद्योगिक प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन बड़ी भूमिका निभा रहे हैं। खासतौर पर राजधानी ढाका की स्थिति चिंताजनक होती जा रही है। हालिया मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, प्रदूषण के कारण यहां हवा और पानी की गुणवत्ता लगातार खराब हो रही है, जिसका सीधा असर लोगों की सेहत पर पड़ रहा है।
रिपोर्ट के मुताबिक, भले ही बांग्लादेश वैश्विक कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में केवल 0.3 प्रतिशत का योगदान देता है, लेकिन इसके बावजूद ढाका दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों में शामिल हो चुका है। यहां का एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) अक्सर बेहद खराब श्रेणी में दर्ज किया जाता है। इसका नतीजा यह है कि राजधानी में अस्थमा, फेफड़ों का कैंसर, ब्रोंकाइटिस, निमोनिया और क्रॉनिक ऑब्स्ट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (COPD) जैसी गंभीर बीमारियों के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि बांग्लादेश की भौगोलिक स्थिति भी समस्या को और गंभीर बना रही है। देश की जमीन नीची और समतल होने के कारण जलवायु परिवर्तन का असर यहां ज्यादा देखने को मिलता है। बाढ़, जलभराव और प्रदूषित पानी से संक्रमण का खतरा लगातार बना रहता है। फिलहाल बांग्लादेश की आबादी करीब 17 करोड़ 40 लाख है और संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2050 तक यह क्षेत्र दुनिया के सबसे अधिक जनसंख्या वाले इलाकों में शामिल हो सकता है।
ढाका के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डिजीज ऑफ द चेस्ट एंड हॉस्पिटल से जुड़े डॉक्टरों का कहना है कि अगर प्रदूषण पर जल्द काबू नहीं पाया गया, तो देश का हेल्थ सिस्टम पूरी तरह चरमरा सकता है। बड़ी संख्या में लोग झुग्गियों में रहते हैं, जो अक्सर औद्योगिक क्षेत्रों के आसपास होती हैं। इन इलाकों में न तो साफ पानी की पर्याप्त व्यवस्था है और न ही सही सीवेज सिस्टम, जिससे संक्रमण तेजी से फैलता है।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि ढाका के आसपास मौजूद ईंट भट्टे, कपड़ा और चमड़ा उद्योग पर्यावरण के लिए गंभीर खतरा बन चुके हैं। इन फैक्ट्रियों से निकलने वाला जहरीला धुआं हवा को प्रदूषित करता है, जबकि केमिकल युक्त अपशिष्ट नदियों में छोड़े जाने से जल प्रदूषण बढ़ रहा है।
स्वास्थ्य सेवाओं पर बढ़ता खर्च भी आम लोगों के लिए बड़ी समस्या बन गया है। इलाज का खर्च चुकाने के लिए कई परिवार कर्ज में डूब जाते हैं। हालात इतने खराब हो जाते हैं कि कुछ लोग रोज़गार की तलाश में विदेश जाने को मजबूर होते हैं, कई बार अवैध रास्तों से यूरोप तक पहुंचने की कोशिश करते हैं।
डॉक्टरों का कहना है कि बीते पांच वर्षों में मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ी है। कई बार आईसीयू में भर्ती के लिए 20 से 30 मरीजों को लंबी कतार में इंतजार करना पड़ता है। विशेषज्ञों ने प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों पर सख्त नियंत्रण को आपात जरूरत बताया है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने औद्योगिक क्षेत्रों को रिहायशी इलाकों से अलग करने, स्वच्छता और सैनिटेशन को लेकर जनजागरूकता बढ़ाने और बेहतर शहरी योजना पर जोर दिया है। आने वाले चुनावों को लेकर भी उम्मीद जताई जा रही है कि नई सरकार इस दिशा में ठोस और प्रभावी कदम उठाएगी, ताकि देश को इस बढ़ते स्वास्थ्य संकट से बचाया जा सके।
With Inputs From IANS