प्रसव के बाद मां और शिशु की देखभाल जरूरी, ये गलतियां न करें
प्रसव के बाद का समय मां और शिशु दोनों के लिए बेहद संवेदनशील होता है। डिलीवरी के बाद अक्सर ध्यान केवल बच्चे पर रहता है
प्रसव के बाद का समय मां और नवजात शिशु दोनों के लिए बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण होता है। अक्सर देखा जाता है कि डिलीवरी के बाद सारा ध्यान बच्चे की देखभाल पर केंद्रित हो जाता है, जबकि मां की सेहत को नजरअंदाज कर दिया जाता है। यह समझना बहुत जरूरी है कि जब मां स्वस्थ और मजबूत रहेगी, तभी वह बच्चे की सही तरीके से देखभाल कर पाएगी। इस दौर में की गई छोटी-सी लापरवाही भी आगे चलकर मां और शिशु दोनों की सेहत पर नकारात्मक असर डाल सकती है।
डिलीवरी के बाद मां का शरीर काफी कमजोर हो जाता है। गर्भावस्था और प्रसव के दौरान शरीर की ऊर्जा, खून और जरूरी पोषक तत्वों की कमी हो जाती है। ऐसे में मां को भरपूर आराम, शांत माहौल और परिवार के सहयोग की सबसे ज्यादा जरूरत होती है। अत्यधिक घरेलू काम, नींद की कमी और मानसिक तनाव मां की रिकवरी को धीमा कर सकते हैं। आयुर्वेद भी मानता है कि इस समय मां को चिंता, डर और तनाव से दूर रखना चाहिए, क्योंकि इसका सीधा असर स्तनपान और दूध बनने की प्रक्रिया पर पड़ता है।
प्रसवोत्तर समय में खान-पान का विशेष ध्यान रखना बेहद जरूरी है। मां को हल्का, सुपाच्य और पोषण से भरपूर भोजन दिया जाना चाहिए। हरी सब्जियां, दालें, दूध और दूध से बने उत्पाद, दलिया, खिचड़ी और सीमित मात्रा में घी शरीर को ताकत देने में मदद करते हैं। आयुर्वेद में मेथी, जीरा, सौंफ, अदरक और शतावरी को विशेष रूप से लाभकारी माना गया है। ये न सिर्फ शरीर की कमजोरी दूर करते हैं, बल्कि मां के दूध की मात्रा बढ़ाने में भी सहायक होते हैं। बहुत ठंडा, बासी, तला-भुना और मसालेदार भोजन इस समय नुकसान पहुंचा सकता है, इसलिए इससे बचना चाहिए।
शारीरिक देखभाल भी उतनी ही जरूरी है। डिलीवरी के बाद हल्की मालिश, गुनगुने पानी से स्नान और धीरे-धीरे किए जाने वाले हल्के व्यायाम शरीर को फिर से संतुलन में लाने में मदद करते हैं। इससे पेट और कमर की मांसपेशियां मजबूत होती हैं और दर्द में भी राहत मिलती है। हालांकि, किसी भी तरह की भारी या तेज एक्सरसाइज बिना डॉक्टर की सलाह के नहीं करनी चाहिए।
इस समय मां की मानसिक और भावनात्मक स्थिति को भी नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। हार्मोनल बदलावों के कारण मां को उदासी, चिड़चिड़ापन, घबराहट या अत्यधिक थकान महसूस हो सकती है। ऐसे में परिवार का प्यार, समझदारी और सहयोग मां के लिए बहुत जरूरी होता है। जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ से सलाह लेने में भी संकोच नहीं करना चाहिए।
नवजात शिशु की बात करें तो जन्म के तुरंत बाद मां का पहला दूध, जिसे कोलोस्ट्रम कहा जाता है, बच्चे के लिए बेहद लाभकारी होता है। इसे बच्चे को जरूर पिलाना चाहिए। पहले छह महीनों तक केवल मां का दूध ही शिशु के लिए सबसे उत्तम आहार माना जाता है। इससे बच्चे की रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होती है और उसका विकास बेहतर होता है। साथ ही बच्चे की साफ-सफाई, गर्माहट और समय-समय पर स्तनपान का ध्यान रखना भी बेहद जरूरी है।
सही और समय पर की गई प्रसवोत्तर देखभाल इस नाजुक दौर को मां और बच्चे दोनों के लिए सुरक्षित, स्वस्थ और सुखद बना सकती है।
With Inputs From IANS