जनता के भरोसे की कमी से पाकिस्तान में पोलियो उन्मूलन रुका
तीन दशकों से अधिक समय से चल रहे उन्मूलन अभियानों के बावजूद पाकिस्तान में पोलियो अब भी एक गंभीर समस्या बना हुआ है।
पाकिस्तान में पोलियो उन्मूलन को लेकर दशकों से प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद यह बीमारी देश से पूरी तरह खत्म नहीं हो पाई है। लगातार चलाए गए आक्रामक टीकाकरण अभियानों के बावजूद पोलियो आज भी पाकिस्तान के लिए एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बना हुआ है। विशेषज्ञों और मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इसकी सबसे बड़ी वजह जनता का अविश्वास, व्यवस्थागत कमजोरियां और सुरक्षा से जुड़ी समस्याएं हैं।
पाकिस्तान ने पहली बार वर्ष 1994 में राष्ट्रीय स्तर पर पोलियो विरोधी अभियान की शुरुआत की थी। हालांकि, बीते 31 वर्षों में देश में कुल 14,206 पोलियो मामलों की पुष्टि हो चुकी है। यह आंकड़ा दर्शाता है कि तमाम प्रयासों के बावजूद उन्मूलन अभियान अपेक्षित सफलता हासिल नहीं कर सके हैं।
रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि पोलियो से प्रभावित बच्चों और वयस्कों के इलाज, पुनर्वास और सामाजिक पुनःस्थापन के लिए सरकार के पास कोई ठोस और प्रभावी व्यवस्था नहीं है। न तो देश में पर्याप्त सार्वजनिक पुनर्वास केंद्र हैं, न ही दिव्यांगों के लिए व्यावसायिक प्रशिक्षण कार्यक्रम या मनो-सामाजिक सहयोग की कोई संगठित प्रणाली मौजूद है। इसके चलते पोलियो से प्रभावित परिवारों को महंगे निजी इलाज पर निर्भर रहना पड़ता है, जो अधिकांश लोगों के लिए संभव नहीं होता।
इस संरचित सहयोग की कमी के कारण पोलियो पीड़ित एक तरह से “अदृश्य आबादी” बन गए हैं। ऐसे बच्चे और वयस्क शिक्षा, रोजगार और सामाजिक भागीदारी में गंभीर बाधाओं का सामना कर रहे हैं। कई मामलों में वे उपेक्षा और शोषण के शिकार भी हो रहे हैं।
राष्ट्रीय आपातकालीन संचालन केंद्र के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 1994 में पाकिस्तान में पोलियो के सबसे अधिक 2,635 मामले दर्ज किए गए थे। इसके बाद कुछ वर्षों तक मामलों में गिरावट जरूर आई, लेकिन बीमारी पूरी तरह समाप्त नहीं हो सकी।
चिंताजनक बात यह है कि वर्ष 2025 में एक बार फिर पोलियो मामलों में बढ़ोतरी देखी गई। इस दौरान देशभर से कुल 30 नए मामले सामने आए। इनमें से सबसे अधिक 19 मामले खैबर-पख्तूनख्वा से दर्ज किए गए, जबकि सिंध से 9, पंजाब और गिलगित-बाल्टिस्तान से एक-एक मामला सामने आया। खैबर-पख्तूनख्वा के उत्तर वज़ीरिस्तान, लक्की मरवत, टैंक, डेरा इस्माइल खान, लोअर कोहिस्तान, तोरघर और बन्नू जैसे इलाके सबसे अधिक प्रभावित रहे।
विशेषज्ञों का कहना है कि पोलियो के बने रहने का सबसे बड़ा कारण जनता में टीकाकरण को लेकर गहरा अविश्वास है। गलत सूचनाएं, राजनीतिक हस्तक्षेप और सुरक्षा चुनौतियां मिलकर पोलियो ड्रॉप्स को विवाद का विषय बना देती हैं। इसके अलावा, कमजोर जनसंपर्क रणनीतियां और पर्यावरणीय निगरानी की कमी भी समस्या को गंभीर बना रही हैं। कई प्रांतों के सीवेज नमूनों में अब भी पोलियो वायरस की मौजूदगी पाई जा रही है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक जनता का भरोसा बहाल नहीं किया जाता, सुरक्षा व्यवस्था मजबूत नहीं होती और पुनर्वास व निगरानी तंत्र को सुदृढ़ नहीं किया जाता, तब तक पाकिस्तान में पोलियो उन्मूलन एक बड़ी चुनौती बना रहेगा।
With Inputs From IANS