भारत में पहली बार 'इच्छामृत्यु' की अनुमति: सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, जानें क्या है पैसिव यूथेनेशिया और हरीश राणा का मामला
सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के 32 वर्षीय हरीश राणा को 'पैसिव यूथेनेशिया' यानी निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दे दी है.
भारत के न्यायिक इतिहास में आज एक बड़ा मोड़ आया है.सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद निवासी 32 वर्षीय हरीश राणा को 'पैसिव यूथेनेशिया' (Passive Euthanasia) यानी निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दे दी है. यह देश का ऐसा पहला मामला है जहाँ अदालत ने गरिमा के साथ मरने के अधिकार (Right to Die with Dignity) को मान्यता देते हुए जीवन रक्षक प्रणाली हटाने का आदेश दिया है.
क्या है पूरा मामला?
हरीश राणा 13 साल पहले अपने पीजी की चौथी मंजिल से गिर गए थे. इस दर्दनाक हादसे में उनके मस्तिष्क में गंभीर चोट आई, जिसके कारण वे 'परमानेंट वेजिटेटिव स्टेट' (PVS) में चले गए. पिछले 12 वर्षों से वे पूरी तरह से बिस्तर पर थे और 100% क्वाड्रिप्लेजिया (हाथ-पांव का लकवा) से जूझ रहे थे. जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने पाया कि हरीश केवल सर्जरी द्वारा लगाए गए पीईजी ट्यूब के माध्यम से मिलने वाले पोषण (CAN) के सहारे जीवित थे और उनकी स्थिति में सुधार की कोई गुंजाइश नहीं बची थी.
सुप्रीम कोर्ट का आदेश और गरिमा का अधिकार
अदालत ने हरीश के पिता की याचिका पर विचार करते हुए आदेश दिया कि हरीश को AIIMS (एम्स) दिल्ली के पैलिएटिव केयर सेंटर में भर्ती किया जाए. वहां उनके जीवन रक्षक उपचार और पोषण (Clinically Administered Nutrition) को धीरे-धीरे वापस लिया जाए या बंद कर दिया जाए. एम्स प्रशासन यह सुनिश्चित करे कि इस पूरी प्रक्रिया के दौरान हरीश की "मानवीय गरिमा" बनी रहे. अदालत ने स्पष्ट किया कि यह आदेश 2018 के 'कॉमन कॉज' फैसले (2023 में संशोधित) के अनुरूप है, जिसमें शीर्ष अदालत ने गरिमापूर्ण मृत्यु को मौलिक अधिकार माना था.
पैसिव यूथेनेशिया का मतलब क्या है?
अक्सर लोग 'इच्छामृत्यु' को जहर का इंजेक्शन देने जैसा समझते हैं, लेकिन पैसिव यूथेनेशिया अलग है.इसमें मरीज को जानबूझकर मारा नहीं जाता, बल्कि उन उपचारों (जैसे वेंटिलेटर, फीडिंग ट्यूब या दवाएं) को रोक दिया जाता है जो मरीज को कृत्रिम रूप से जीवित रख रहे होते हैं. इसका उद्देश्य मरीज को प्रकृति के भरोसे छोड़ना है ताकि वह बिना किसी कृत्रिम खिंचाव के शांति से शरीर त्याग सके.
कानूनी संघर्ष का अंत
हरीश के पिता ने पहले दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, लेकिन वहां से राहत नहीं मिली.इसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दी. उन्होंने बताया कि उनके बेटे की स्थिति लगातार बिगड़ रही थी और वह किसी भी उपचार पर प्रतिक्रिया नहीं दे रहा था. अदालत ने मानवीय आधार पर पिता की पीड़ा को समझा और यह ऐतिहासिक निर्णय सुनाया.