अल्जाइमर के इलाज में भारत की बड़ी जीत, वैज्ञानिकों ने बनाया दुनिया का पहला 'स्मार्ट मॉलिक्यूल', शुरुआती स्टेज में ही पकड़ी जाएगी बीमारी
भूलने की बीमारी यानी अल्जाइमर (Alzheimer’s) को लेकर अब तक दुनिया भर के डॉक्टर बेबस थे, क्योंकि इसका कोई स्थायी इलाज मौजूद नहीं था.
भूलने की बीमारी यानी अल्जाइमर (Alzheimer’s) को लेकर अब तक दुनिया भर के डॉक्टर बेबस थे, क्योंकि इसका कोई स्थायी इलाज मौजूद नहीं था. लेकिन अब भारतीय वैज्ञानिकों ने एक ऐसा कमाल कर दिखाया है, जो इस बीमारी की तस्वीर बदल सकता है. IIT-BHU के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. ज्ञान प्रकाश मोदी ने दुनिया का पहला ऐसा मॉलिक्यूल 'I-43'तैयार किया है, जो अल्जाइमर की पहचान (Diagnosis) और इलाज (Treatment) दोनों एक साथ कर सकता है. इस रिसर्च को प्रतिष्ठित 'नेचर' (Nature) पब्लिकेशन में भी जगह मिली है.
क्यों खास है यह नई खोज?
AIIMS नई दिल्ली के बायोफिजिक्स विभाग के डॉ. सरोज कुमार के अनुसार, अब तक बाजार में मौजूद दवाएं केवल लक्षणों (जैसे याददाश्त कम होना) को कुछ समय के लिए दबाती थीं, बीमारी को ठीक नहीं करती थीं। लेकिन 'I-43' मॉलिक्यूल सीधे बीमारी की जड़ पर प्रहार करता है.
इस मॉलिक्यूल की 3 बड़ी विशेषताएं
अल्जाइमर के लक्षण दिखने में अक्सर 15-20 साल लग जाते हैं. यह मॉलिक्यूल शरीर में बीमारी घुसते ही उसकी पहचान कर सकता है.
यह मस्तिष्क में जहर फैलाने वाले एंजाइम (ऐसेटाइलकॉलिनेस्ट्रेज) को ब्लॉक करता है और हानिकारक प्रोटीन (एमेलॉएड बीटा) को बनने से रोकता है.
यह मस्तिष्क की कोशिकाओं को होने वाले नुकसान से भी बचाता है.
कैसे तैयार हुई यह 'जादुई' दवा?
इस सफलता के पीछे भारत के तीन बड़े संस्थानों की मेहनत है.
IIT-BHU के यहां डॉ. ज्ञान प्रकाश मोदी ने इस मॉलिक्यूल को डिजाइन और तैयार किया.
AIIMS, नई दिल्ली- यहाँ इस मॉलिक्यूल की प्रभावशीलता की पुष्टि और क्लीनिकल वैलिडेशन किया गया.
NII (नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ इम्यूनोलॉजी)- डॉ. सारिका गुप्ता की देखरेख में चूहों पर इसका सफल परीक्षण किया गया.
इंतजार अब बस क्लीनिकल ट्रायल का
इस मॉलिक्यूल का प्री-क्लीनिकल ट्रायल (जानवरों पर परीक्षण) सफल रहा है और ICMR के माध्यम से इसका पेटेंट भी करा लिया गया है. अब इंसानों पर इसके क्लीनिकल ट्रायल शुरू हो रहे हैं.