बच्चों में मेमोरी ओवरलोड: कब हो जाता है यह हद से ज़्यादा? – डॉ सुजाता त्यागराजन
हमारी आधुनिक दुनिया बहुत तेज़ रफ्तार से चल रही है। एक बाल रोग विशेषज्ञ के रूप में, मैं देख रही हूँ कि आज के बच्चे सिर्फ पढ़ाई के दबाव से ही नहीं, बल्कि स्क्रीन, लगातार ध्यान भटकाने वाले कारकों और तनाव से भी जूझ रहे हैं—जो उनके नन्हे दिमाग़ पर ज़रूरत से ज़्यादा बोझ डाल रहे हैं। यह “मेमोरी ओवरलोड” धीरे-धीरे बच्चे की एकाग्रता, सीखने की क्षमता और याददाश्त को कमजोर कर सकता है।
मेमोरी ओवरलोड तब होता है जब दिमाग़ पर एक साथ बहुत ज़्यादा जानकारी, बहुत अधिक ध्यान भटकाने वाले तत्व और पर्याप्त आराम की कमी होती है। इसे ऐसे समझिए जैसे किसी सूटकेस में ज़रूरत से ज़्यादा सामान ठूंसने की कोशिश करना—चाहे आप कितना भी संभलकर पैक करें, चीज़ें बाहर आने लगती हैं। बच्चों में इसका असर इस रूप में दिख सकता है कि वे पढ़ा हुआ भूलने लगते हैं, परीक्षा के दौरान अचानक सब भूल जाते हैं, ध्यान केंद्रित नहीं कर पाते या अच्छी नींद के बाद भी मानसिक थकान महसूस करते हैं।
हालिया अध्ययनों से पता चलता है कि जीवनशैली और वातावरण इस समस्या को और बढ़ा रहे हैं। एक अध्ययन के अनुसार, भारत में पाँच साल से कम उम्र के बच्चे रोज़ाना औसतन 2.22 घंटे स्क्रीन देखते हैं—जो विश्व स्वास्थ्य संगठन और इंडियन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स की सिफारिशों से लगभग दोगुना है।
अधिक स्क्रीन टाइम का संबंध भाषा विकास में देरी, कमजोर संज्ञानात्मक क्षमता, सामाजिक व्यवहार में कमी और एकाग्रता की समस्या से पाया गया। वहीं, अन्य अध्ययनों ने यह भी दिखाया है कि घर पर ज़्यादा स्क्रीन टाइम नींद में खलल डालता है, चिंता बढ़ाता है और व्यवहार संबंधी समस्याएँ पैदा करता है। इसी कारण भारत भर के डॉक्टर परिवारों में बेहतर “डिजिटल हाइजीन” अपनाने पर ज़ोर दे रहे हैं।
नींद भी इस पूरी समस्या का एक अहम हिस्सा है। पहली कक्षा के बच्चों पर किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि अनियमित और अपर्याप्त नींद से वर्बल वर्किंग मेमोरी प्रभावित होती है—यानी भाषा से जुड़ी जानकारी को समझने और इस्तेमाल करने की क्षमता कमजोर हो जाती है।
दिनभर सीखी गई बातों को दिमाग़ तभी व्यवस्थित करता है, जब उसे पर्याप्त नींद मिलती है। लंबे समय तक बना रहने वाला तनाव भी याददाश्त पर बुरा असर डालता है। शोध बताते हैं कि स्कूल या पारिवारिक माहौल से जुड़े ज़्यादा तनाव में रहने वाले बच्चे, तनावपूर्ण स्थिति के बाद मेमोरी से जुड़े कार्यों में ज़्यादा गलतियाँ करते हैं। तनाव हार्मोन कॉर्टिसोल का उच्च स्तर दिमाग़ की जानकारी को सहेजने और दोबारा याद करने की क्षमता में सीधा हस्तक्षेप करता है।
बच्चे मेमोरी ओवरलोड के प्रति इसलिए भी ज़्यादा संवेदनशील होते हैं क्योंकि उनका दिमाग़ अभी विकसित हो रहा होता है। उनकी वर्किंग मेमोरी और शॉर्ट-टर्म मेमोरी वयस्कों की तुलना में जल्दी प्रभावित हो सकती है।
आज के माहौल में स्क्रीन की अधिक उत्तेजना, देर रात तक जागना, होमवर्क, गेम्स और सोशल मीडिया के बीच बार-बार ध्यान बदलना इस समस्या को और बढ़ा देता है। नियमित नींद, जो याददाश्त को मजबूत करने के लिए ज़रूरी है, अक्सर देर रात स्क्रॉलिंग या प्रोजेक्ट्स की भेंट चढ़ जाती है। पढ़ाई का तनाव ही नहीं, बल्कि दोस्तों से जुड़े सामाजिक दबाव भी बच्चों के दिमाग़ को थका देते हैं और उसकी कार्यक्षमता घटा देते हैं।
अक्सर माता-पिता को यह समझने के लिए किसी मेडिकल टेस्ट की ज़रूरत नहीं होती कि कुछ ठीक नहीं है। वे देखते हैं कि बच्चा साधारण बातों को समझने में दिक्कत महसूस कर रहा है, पढ़ाई पर ध्यान नहीं लगा पा रहा या आसपास फोन और टैबलेट होते ही आसानी से भटक जाता है। घंटों पढ़ने के बाद भी नंबर गिरने लगते हैं या बच्चा असामान्य रूप से चिड़चिड़ा और थका हुआ महसूस करता है। ये संकेत हल्के हो सकते हैं, लेकिन बताते हैं कि बच्चे का दिमाग़ ओवरलोड हो रहा है।
अच्छी बात यह है कि ज़्यादातर मामलों में मेमोरी ओवरलोड के कारण बदले जा सकते हैं। सबसे पहले, स्क्रीन टाइम कम करना—खासतौर पर सोने से पहले—ध्यान और नींद दोनों में सुधार ला सकता है। छोटे बच्चों के लिए शैक्षणिक कंटेंट भी सीमित और निगरानी में होना चाहिए।
हर रात एक तय समय पर सोने की दिनचर्या और शांत वातावरण दिमाग़ को दिनभर की सीख को मज़बूत करने में मदद करता है। पढ़ाई के दौरान मोबाइल जैसे ध्यान भटकाने वाले उपकरण हटाएँ, छोटे-छोटे समय के लिए पढ़ाई कराएँ और सक्रिय सीखने की गतिविधियाँ अपनाएँ। किताबें पढ़ना, परिवार के साथ समय बिताना, कला, पज़ल्स और बातचीत—ये सभी स्क्रीन देखने से कहीं ज़्यादा फायदेमंद हैं।
तनाव प्रबंधन भी उतना ही ज़रूरी है। बच्चों की चिंताओं पर खुलकर बात करना, एक नियमित दिनचर्या देना और अंकों का अनावश्यक दबाव कम करना उन्हें सीखने के दौरान अधिक सुरक्षित महसूस कराता है। बाहर खेलना और नियमित शारीरिक गतिविधि न सिर्फ फिटनेस बढ़ाती है, बल्कि दिमाग़ के कामकाज, एकाग्रता और भावनात्मक संतुलन को भी बेहतर बनाती है।
हालांकि, अगर कई हफ्तों तक याददाश्त की समस्या बनी रहे, पढ़ाई में लगातार गिरावट दिखे, नींद की परेशानी हो या चिंता और अवसाद के लक्षण नज़र आएँ, तो विशेषज्ञ की मदद लेना ज़रूरी हो जाता है। बाल रोग विशेषज्ञ चिकित्सा या नींद से जुड़ी समस्याओं की जाँच कर सकते हैं और ज़रूरत पड़ने पर बाल मनोवैज्ञानिक या न्यूरो-डेवलपमेंट विशेषज्ञ सीखने या ध्यान संबंधी समस्याओं, जैसे ADHD, का आकलन कर सकते हैं।
अंततः, मेमोरी ओवरलोड सिर्फ “खराब याददाश्त का दिन” नहीं है। यह संकेत है कि बच्चे का दिमाग़ एक साथ बहुत ज़्यादा दिशाओं में खिंच रहा है। ज़्यादा स्क्रीन, कम नींद और लगातार तनाव मिलकर दिमाग़ में एक तरह का मानसिक ट्रैफिक जाम बना देते हैं। लेकिन घर और स्कूल में छोटे-छोटे, लगातार किए गए बदलाव बच्चों को संतुलन वापस पाने में मदद कर सकते हैं—ताकि उनका दिमाग़ आराम, लय और एकाग्रता के साथ बेहतर तरीके से आगे बढ़ सके।
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