सावधान! ईयरफोन की ये आदतें छीन सकती हैं आपकी सुनने की ताकत, डॉक्टर ने दी बड़ी चेतावनी

कान में दिन भर हेडफोन लगाकर गाना सुनना या बात करना आपके लिए कितना नुकसानदायक है ये आप सोच भी नहीं सकते.

Update: 2026-03-24 05:15 GMT

आज के समय में आप देखेंगे कि हर दूसरे व्यक्ति कान में इयरफोन्स लगाए हुए हैं. चाहे वह बस, ट्रेन, हो या मेट्रो. खासकर युवाओं में ये आदत ज्यादा देखने को मिलती है. लेकिन इसका जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल आपके लिए नुकसानदायक हो सकता है इसके बारे में आप डॉक्टर से ही सुनिए. वासवी हॉस्पिटल्स की कंसल्टेंट ENT सर्जन डॉ. यशस्वी श्रीकाकुलम के अनुसार, ईयर बड्स का बार-बार इस्तेमाल करना, कान में कोई चीज डालना और हेडफ़ोन से आने वाली तेज आवाज़ों के संपर्क में लंबे समय तक रहना, सुनने की समस्याओं के आम कारण बनकर उभर रहे हैं.

कानों को पहुंचा रहे इस तरह से नुकसान

कानों के स्वास्थ्य और सुनने की क्षमता में कमी के बारे में बात करते हुए, एक्सपर्ट कहते हैं कि कई लोग अनजाने में अपने कानों को साफ करने की कोशिश में उन्हें नुकसान पहुंचा लेते हैं. “कान के तीन हिस्से होते हैं, बाहरी कान, मध्य कान और भीतरी कान. ज़्यादातर लोग ईयर बड्स, सेफ़्टी पिन, पेंसिल या पेन जैसी चीज़ें कान में डालकर बाहरी कान को नुकसान पहुंचाते हैं. इससे सख्ती से बचना चाहिए,” उन्होंने कहा.

बड़े मामलों में कान का ऑपरेशन करना जरूरी

जीवनशैली से जुड़े कारणों की वजह से, कम उम्र के वयस्कों में सुनने की क्षमता में कमी की समस्या बढ़ती हुई दिखाई दे रही है. “सुनने की क्षमता में कमी को मोटे तौर पर दो हिस्सों में बांटा जा सकता है. कंडक्टिव हियरिंग लॉस (जिसमें बाहरी या मध्य कान शामिल होता है) और सेंसरीन्यूरल हियरिंग लॉस (जिसमें भीतरी कान या नस शामिल होती है),” डॉ. श्रीकाकुलम बताती हैं. कुछ स्थितियां, जैसे कि ओटोस्क्लेरोसिस (एक आनुवंशिक विकार जो मध्य कान की हड्डियों को प्रभावित करता है), भी सुनने की समस्याएं पैदा कर सकती हैं और इनके लिए सर्जिकल इलाज की ज़रूरत पड़ सकती है.

क्या आप नियमित रूप से अपने कानों से वैक्स (मोम) खुरचकर निकालने की कोशिश करते हैं? खैर, इसकी कोई ज़रूरत नहीं है. “लगभग 80 से 90 प्रतिशत लोगों को कान साफ़ करने की ज़रूरत नहीं होती है. कान खुद-ब-खुद साफ़ होते रहते हैं और वैक्स आमतौर पर अपने आप ही बाहर निकल आता है. जब लोग खुद वैक्स निकालने की कोशिश करते हैं, तो वे अक्सर उसे कान की नली में और अंदर धकेल देते हैं, जिससे दर्द और रुकावट हो सकती है,” डॉ. यशस्वी श्रीकाकुलम बताती हैं. अगर ज़्यादा वैक्स की वजह से कोई परेशानी या सुनने में दिक्कत हो, तो मरीज़ों को घरेलू नुस्खे आज़माने के बजाय किसी ENT एक्सपर्ट से सलाह लेनी चाहिए.

हेडफ़ोन और ईयरबड्स का तेज आवाज के नुकसान

आजकल कम उम्र के वयस्कों में सुनने की क्षमता में कमी का एक बड़ा कारण हेडफ़ोन और ईयरबड्स का तेज आवाज़ में इस्तेमाल करना है. “हेडफ़ोन या AirPods के ज़रिए लगातार तेज़ आवाज़ सुनने से सुनने की क्षमता को नुकसान पहुंच सकता है. अब हम 40 साल तक की उम्र के ऐसे मरीज़ों को भी देख रहे हैं, जिनकी सुनने की क्षमता में कमी का संबंध लंबे समय तक तेज़ डेसिबल वाली आवाज़ के संपर्क में रहने से है,” डॉक्टर कहती हैं. वह सुरक्षात्मक ईयरमफ़ या ईयरप्लग इस्तेमाल करने और नियमित रूप से सुनने की जांच करवाने की सलाह देती हैं.

कब लेनी चाहिए डॉक्टर की सलाह

बच्चों में सुनने की समस्याओं का पता अक्सर देर से चलता है, क्योंकि माता-पिता इन लक्षणों को व्यवहार से जुड़ी समस्याएं समझ लेते हैं. “अगर कोई बच्चा आवाज़ों पर कोई प्रतिक्रिया नहीं देता है, तेज आवाज़ों से चौंकता नहीं है, या उसकी बोलने की क्षमता का विकास देर से होता है, तो माता-पिता को डॉक्टरी सलाह लेनी चाहिए,” डॉ. यशस्वी श्रीकाकुलम कहती हैं. जिन बच्चों को सुनने में दिक्कत होती है, उन्हें निर्देशों का पालन करने में भी परेशानी हो सकती है. वे बार-बार शिक्षकों से कही गई बात दोहराने के लिए कह सकते हैं, या क्लासरूम में आगे की लाइन में बैठना पसंद कर सकते हैं.

शिशुओं और छोटे बच्चों में, डॉक्टर आमतौर पर सुनने की क्षमता का पता लगाने के लिए कुछ खास स्क्रीनिंग टेस्ट करते हैं, जैसे कि Otoacoustic Emission (OAE) और Brainstem Evoked Response Audiometry (BERA). उन्होंने बताया, “ये टेस्ट यह पता लगाने में मदद करते हैं कि सुनने वाली नस ठीक से काम कर रही है या नहीं. अगर सुनने की क्षमता में गंभीर कमी पाई जाती है, तो कोक्लियर इम्प्लांट जैसे उपायों की सलाह दी जा सकती है.”

बच्चों में कुछ समय के लिए सुनने की क्षमता कम होने का एक आम कारण “ग्लू ईयर” (glue ear) है. इसमें कान के बीच वाले हिस्से में तरल पदार्थ जमा हो जाता है, जो अक्सर सर्दी या किसी इन्फेक्शन के बाद होता है. उन्होंने कहा, “इस स्थिति के कारण सुनने की क्षमता में लगभग 50 से 60 डेसिबल तक की कमी आ सकती है, जिससे स्कूल में बच्चे को साफ-साफ सुनने में दिक्कत होती है. इसका शुरुआती इलाज दवाओं से किया जाता है. लेकिन, अगर यह स्थिति बनी रहती है, तो तरल पदार्थ को बाहर निकालने और सुनने की क्षमता वापस लाने के लिए एक छोटी सी सर्जरी की जा सकती है, जिसे ‘मायरिंगोटॉमी विद ग्रोमेट इन्सर्शन’ (myringotomy with grommet insertion) कहते हैं.”

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