बसंत ऋतु (मार्च-अप्रैल) में दही खाना सेहत के लिए कितना सही? जानें क्या कहते हैं आयुर्वेद विशेषज्ञ

क्या आप जानते हैं कि इस सुहावने मौसम में दही का सेवन आपकी सेहत बिगाड़ सकता है?

Update: 2026-03-05 05:45 GMT

फरवरी और मार्च का महीना यानी फागुन-चैत का समय, जब प्रकृति बसंत के रंग में घुली होती है.लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस सुहावने मौसम में दही का सेवन आपकी सेहत बिगाड़ सकता है? समस्तीपुर जिले के आयुर्वेदाचार्य डॉ. रंजन कुमार के अनुसार, बसंत ऋतु में दही का सेवन बहुत सोच-समझकर करना चाहिए, अन्यथा यह कई बीमारियों का कारण बन सकता है.

आयुर्वेद में दही को क्यों कहा गया है 'अभिष्यंदी'?

डॉ. रंजन कुमार ने बताया कि आयुर्वेद में दही को 'अभिष्यंदी' की कैटगरी में रखा गया है. 'अभिष्यंदी' का सरल अर्थ है, ऐसा आहार जो शरीर की सूक्ष्म नाड़ियों (Channels) में रुकावट पैदा कर सकता है. बसंत ऋतु में जब मौसम सर्दी से गर्मी की ओर बदल रहा होता है, तब शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) संवेदनशील होती है. ऐसे में दही का भारीपन नाड़ियों में अवरोध पैदा कर कफ दोष को बढ़ा देता है.

किन मौसमों में दही है 'वर्जित' और कहां 'वरदान'?

शरद, ग्रीष्म और बसंत ऋतु (मार्च से जुलाई तक) में दही का सेवन हानिकारक माना गया है। इस समय जठराग्नि (पाचन शक्ति) कमजोर होती है, जिससे दही पचाना कठिन होता है. हेमंत और शिशिर ऋतु (छठ से होली तक) में दही खाना फायदेमंद है, क्योंकि इस दौरान पाचन शक्ति बहुत मजबूत रहती है. अस्थमा, एलर्जी और बार-बार जुकाम से पीड़ित लोगों को मार्च-अप्रैल में दही से पूरी तरह परहेज करना चाहिए.

दही के सेवन का सही तरीका: विशेषज्ञ की सलाह

अगर आप इस मौसम में दही के शौकीन हैं, तो डॉ. रंजन कुमार ने कुछ महत्वपूर्ण सुझाव दिए हैं. गाढ़ा और जमा हुआ दही अधिक 'अभिष्यंदी' होता है। इसके बजाय दही को फेंटकर मट्ठा (छाछ) बनाकर पिएं. मट्ठा हल्का और सुपाच्य होता है. पाइल्स के मरीजों के लिए सीधा दही नुकसानदायक है, जबकि मट्ठा पाचन को संतुलित करने के लिए औषधि समान है. आहार का चुनाव हमेशा शरीर की प्रकृति (वात, पित्त, कफ) के अनुसार करें.

Tags:    

Similar News