ग्लूकोमा, आंखों की रोशनी चुराने वाला 'साइलेंट किलर', भारत में 1.2 करोड़ लोग प्रभावित, जानें बचाव के तरीके

ग्लूकोमा, जिसे आम भाषा में 'काला मोतिया' भी कहा जाता है, आज एक बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बन चुका है.

Update: 2026-03-12 08:00 GMT

ग्लूकोमा, जिसे आम भाषा में 'काला मोतिया' भी कहा जाता है, आज एक बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बन चुका है. विशेषज्ञों के अनुसार, भारत में लगभग 1.2 करोड़ लोग इस बीमारी की चपेट में हैं. सबसे डरावनी बात यह है कि करीब 90 प्रतिशत मामलों का समय पर पता ही नहीं चल पाता, क्योंकि शुरुआती चरण में इसके कोई स्पष्ट लक्षण नहीं होते. हाल ही में विश्व ग्लूकोमा सप्ताह के अवसर पर आयोजित एक कार्यक्रम में एम्स (AIIMS) और अन्य संस्थानों के वरिष्ठ नेत्र विशेषज्ञों ने इस 'साइलेंट थीफ ऑफ साइट' (दृष्टि चुराने वाला खामोश चोर) के प्रति आगाह किया है.

क्यों खतरनाक है काला मोतिया?

काला मोतिया धीरे-धीरे आंख की ऑप्टिक नर्व (Optic Nerve) को नुकसान पहुंचाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि ग्लूकोमा के कारण होने वाली दृष्टि हानि स्थायी (Permanent) होती है, यानी एक बार रोशनी जाने के बाद उसे दवाओं या सर्जरी से वापस नहीं लाया जा सकता. हालांकि, समय पर जांच से इसके बढ़ने की गति को रोका जा सकता है.

प्रमुख जोखिम कारक (Risk Factors)

किसे है ग्लूकोमा का सबसे ज्यादा खतरा?

40 वर्ष से अधिक आयु के लोगों में प्रसार दर 2.7 से 4.3 प्रतिशत तक है, अगर परिवार में किसी को ग्लूकोमा है, तो खतरा बढ़ जाता है. मधुमेह (Diabetes) और हाइपरटेंशन के मरीजों को अधिक सावधानी बरतनी चाहिए. लंबे समय तक स्टेरॉयड का उपयोग करना. इंट्राओक्युलर प्रेशर का बढ़ना.

बचाव के अचूक उपाय और विशेषज्ञों की सलाह

डॉ. सुनीता दुबे और डॉ. हर्ष कुमार जैसे दिग्गजों के अनुसार, नियमित नेत्र परीक्षण ही ग्लूकोमा से बचने का एकमात्र रास्ता है. 40 वर्ष से अधिक उम्र के लोग हर साल आंखों की जांच कराएं. अगर पारिवारिक इतिहास है, तो 35 साल की आयु से ही नियमित जांच शुरू कर दें. ऑप्टिक नर्व की जांच और आंखों के दबाव (Pressure) का मापन ग्लूकोमा को पकड़ने में मदद करता है. संतुलित आहार, नियमित व्यायाम और धूम्रपान से परहेज करें. जितनी जल्दी बीमारी का पता चलेगा, लेजर, दवाओं या सर्जरी के माध्यम से दृष्टि को सुरक्षित रखना उतना ही आसान होगा.

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