बचपन की प्रतिकूल घटनाएँ उम्रभर मानसिक स्वास्थ्य को गहरा नुकसान पहुँचाती हैं
बचपन की प्रतिकूल घटनाएँ मानसिक स्वास्थ्य को गहराई से प्रभावित करती हैं और जीवनभर भावनाओं व व्यवहार को आकार देती हैं।
बचपन अक्सर हँसी, खेल और बेफ़िक्र दिनों से जुड़ा होता है, लेकिन हर बच्चा ऐसा बचपन नहीं जी पाता। घर में झगड़े, माता-पिता की डाँट, स्कूल में होने वाली बुलिंग या ऑनलाइन ताने बच्चों पर ऐसी गहरी छाप छोड़ते हैं, जो बड़े होकर भी उनके साथ रहती है। इन चोटों की कोई आवाज़ नहीं होती, लेकिन उनका असर बेहद गहरा होता है।
AIIMS के प्रोफेसर डॉ. राजेश सागर कहते हैं, “वयस्क मानसिक बीमारियों के 50% से अधिक मामलों की शुरुआत 14 साल की उम्र से पहले ही हो जाती है। ये वही साल हैं जब बच्चा दुनिया को समझना, दोस्ती करना और अपने आत्मविश्वास की नींव बनाना सीखता है। अगर यही नींव हिल जाए, तो पूरा जीवन प्रभावित होता है।”
कई बार ये घटनाएँ किसी बड़े हादसे की तरह दिखाई नहीं देतीं। बच्चों के रिपोर्ट कार्ड में दर्ज अंकों से अधिक महत्त्व उन टिप्पणियों का होता है जिसमें उनके व्यवहार, स्वभाव, और भावनात्मक बदलाव लिखे होते हैं। डॉ. सागर इसी बारे में कहते हैं, “हम अक्सर स्कूल में बच्चों के अंक देखते हैं, लेकिन सबसे ज़रूरी कॉलम ‘व्यवहार’ का होता है। वही हमें बताता है कि बच्चा भीतर क्या झेल रहा है।”
दोस्त का मज़ाक, किसी बड़े की तुलना, किसी शिक्षक की कठोर टिप्पणी—ये सब बच्चे के मन में वर्षों तक जमा रहते हैं। कई संवेदनशील बच्चे छोटी-सी बात को भी दिल पर ले लेते हैं और धीरे-धीरे अपने अंदर पूरी दुनिया बसा लेते हैं। वे बोलते नहीं, बस चुपचाप, बिना व्यक्त किए, तनाव और डर को अपने भीतर दबाते रहते हैं।
घर और स्कूल का माहौल बच्चे पर सबसे ज़्यादा असर डालता है। डॉ. सागर के शब्दों में, “बच्चा घर में जो भी देखता है—माता-पिता का झगड़ा, तनाव, कठोर भाषा—उसका प्रभाव सीधे उसके मन पर पड़ता है। बच्चा खुद कुछ बोल नहीं पाता, लेकिन सब महसूस करता है।”
बुलिंग और साइबरबुलिंग भी आज बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को गंभीर रूप से प्रभावित कर रहे हैं। वे बताते हैं कि एक अध्ययन में 90% बच्चों ने किसी न किसी प्रकार की बुलिंग का अनुभव बताया है, और यह “छिपी हुई बीमारी” की तरह है जिसे बच्चे अक्सर किसी को बताते ही नहीं। इसका असर उनकी पढ़ाई, आत्मविश्वास और नींद तक पर दिखने लगता है।
लेकिन अच्छी बात यह है कि बच्चों में ठीक होने की क्षमता बेहद मजबूत होती है—अगर उन्हें सही माहौल मिले। डॉ. सागर कहते हैं, “उन्हें ऐसा सुरक्षित वातावरण दीजिए जहाँ वे बिना डर के अपनी बात कह सकें। जब बच्चा महसूस करता है कि उसकी भावनाएँ सुनी जा रही हैं, तभी उसके ठीक होने की शुरुआत होती है।”
वह यह भी कहते हैं कि कई बार माता-पिता खुद इतने चिंतित होते हैं कि उनका डर बच्चों में दोगुना होकर उतरता है। “बच्चे अपने माता-पिता को देखकर सीखते हैं। अगर माता-पिता ही तनाव में हों, तो बच्चा भी वैसा ही महसूस करेगा। इसलिए माता-पिता का स्थिर और सहायक होना बेहद जरूरी है।”
खेल-कूद, हँसी, दोस्ती और खुली बातचीत—ये सब बच्चों की मानसिक मजबूती बढ़ाने के सबसे प्रभावी साधन हैं। डॉक्टर साफ कहते हैं कि कई बार यह दवाओं से भी ज़्यादा असरदार होते हैं। खेल न सिर्फ़ शरीर को मजबूत करते हैं, बल्कि बच्चे को जीवन की सबसे महत्वपूर्ण सीढ़ियाँ सिखाते हैं—हार-जीत को स्वीकारना, टीम में काम करना, और खुद पर भरोसा रखना।
बचपन की नकारात्मक घटनाएँ उम्रभर असर डाल सकती हैं, लेकिन अगर बच्चे को प्यार, समझ, स्थिरता और सही समर्थन मिले, तो यह चोटें भरने लगती हैं। बच्चा वहीं से संभलना शुरू करता है जहाँ कोई पहली बार उसे सच में सुनता है।