अल्ज़ाइमर को लेकर आम जनता में देखी जाने वाली प्रमुख गलतफहमियाँ - डॉ सौरभ यतिश बंसल

Update: 2026-01-07 06:15 GMT

अल्ज़ाइमर रोग को लेकर आम लोगों की समझ में आज भी कई महत्वपूर्ण खामियाँ और गलतफहमियाँ मौजूद हैं। ये भ्रांतियाँ अक्सर बीमारी की पहचान में देरी का कारण बनती हैं और मरीजों की देखभाल की गुणवत्ता को भी प्रभावित करती हैं। सबसे आम गलतफहमी यह है कि याददाश्त का कमजोर होना उम्र बढ़ने का सामान्य हिस्सा है। इसी सोच के चलते लोग शुरुआती चेतावनी संकेतों जैसे बार बार चीज़ें भूल जाना, साधारण समस्याओं को हल करने में कठिनाई होना या रोज़मर्रा के परिचित कामों में परेशानी को नज़रअंदाज़ कर देते हैं और इन्हें सामान्य उम्र का असर मान लेते हैं। यह धारणा नुकसानदायक है क्योंकि अल्ज़ाइमर उम्र बढ़ने की स्वाभाविक प्रक्रिया नहीं है। भले ही इसका कोई स्थायी इलाज नहीं है लेकिन समय पर पहचान होने से लक्षणों को बेहतर तरीके से संभाला जा सकता है और बीमारी की गति को धीमा करने में मदद मिल सकती है जिससे जीवन की गुणवत्ता बेहतर होती है।

एक और बड़ी गलतफहमी अल्ज़ाइमर और डिमेंशिया को एक ही मान लेना है। ये दोनों शब्द एक जैसे नहीं हैं। डिमेंशिया एक व्यापक शब्द है जो स्मृति सोच और दैनिक कार्यों को प्रभावित करने वाले लक्षणों के समूह को दर्शाता है जबकि अल्ज़ाइमर एक विशिष्ट बीमारी है और डिमेंशिया का सबसे आम कारण है। यह अंतर समझना बेहद ज़रूरी है क्योंकि डिमेंशिया के सभी प्रकार एक समान नहीं होते और कुछ मामलों में इसके कारणों का इलाज संभव होता है। सही निदान न होने पर रोग की प्रकृति और आगे की देखभाल को लेकर भ्रम बना रहता है।

अक्सर यह भी माना जाता है कि अल्ज़ाइमर केवल याददाश्त को प्रभावित करता है जबकि वास्तविकता इससे कहीं अधिक व्यापक है। इस बीमारी में व्यवहार और व्यक्तित्व में भी बदलाव देखने को मिलते हैं। अचानक स्वभाव में परिवर्तन मूड में उतार चढ़ाव निर्णय लेने की क्षमता में कमी और रोज़मर्रा के कामों को करने में कठिनाई इसके सामान्य लक्षण हो सकते हैं। इन बदलावों को कई बार ज़िद या भावनात्मक समस्या समझ लिया जाता है जबकि ये मस्तिष्क में हो रहे जैविक परिवर्तनों का परिणाम होते हैं।

एक और प्रचलित धारणा यह है कि अल्ज़ाइमर का निदान हो जाने के बाद कुछ भी नहीं किया जा सकता। यह सोच मरीजों और परिवारों को समय पर चिकित्सा सलाह और सहयोग लेने से रोकती है। जबकि वास्तविकता यह है कि उपलब्ध उपचार देखभाल की योजनाएँ और सहायक सेवाएँ लक्षणों को नियंत्रित करने और दैनिक जीवन को बेहतर बनाने में मदद कर सकती हैं। शोध और क्लिनिकल स्टडीज़ में भागीदारी भी मरीजों और उनके परिजनों के लिए उम्मीद और दिशा प्रदान करती है।

अल्ज़ाइमर की गंभीरता को भी अक्सर कम करके आँका जाता है। यह एक प्रगतिशील और घातक बीमारी है जो समय के साथ निगलने और साँस लेने जैसी बुनियादी क्षमताओं को भी प्रभावित करती है। बीमारी की गंभीरता को न समझने से भविष्य की योजना और देखभाल की तैयारी प्रभावित होती है।

इन सभी गलतफहमियों को दूर करना बेहद आवश्यक है। सही और सटीक जानकारी सामाजिक कलंक को कम करती है लोगों को समय रहते चिकित्सा सहायता लेने के लिए प्रेरित करती है और अल्ज़ाइमर से जूझ रहे मरीजों व उनके परिवारों के लिए बेहतर समर्थन सुनिश्चित करती है।

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