रेचक से चतुर्थ तक, चार प्रकार के होते हैं प्राणायाम, शारीरिक-मानसिक संतुलन में कारगर

प्राणायाम के चार प्रकार शरीर और मन दोनों के संतुलन में मदद करते हैं।

Update: 2026-02-23 14:15 GMT

नई दिल्ली: आज की तेज़ और तनावपूर्ण जीवनशैली में योग और प्राणायाम शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य बनाए रखने के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। भारत सरकार के आयुष मंत्रालय ने लोगों को प्राणायाम को अपनी दिनचर्या में शामिल करने की सलाह दी है। मंत्रालय के अनुसार, नियमित प्राणायाम से श्वास पर नियंत्रण आता है और जीवन में संतुलन स्थापित होता है।

पातंजल योग सूत्र में प्राणायाम को चार मुख्य प्रकारों में वर्गीकृत किया गया है, जो सांस की गति और प्रवाह पर आधारित हैं। इनका अभ्यास शरीर को स्वस्थ रखने, मन को शांत करने और एकाग्रता बढ़ाने में मदद करता है। आयुष मंत्रालय ने कहा कि इन चार प्रकारों का अभ्यास धीरे-धीरे, सही तकनीक से और योग विशेषज्ञ की देखरेख में करना चाहिए। रोजाना 10-15 मिनट का अभ्यास भी लाभकारी होता है। प्राणायाम न केवल शारीरिक स्वास्थ्य सुधारता है, बल्कि चिंता, तनाव और अनिद्रा जैसी समस्याओं को भी कम करता है।

1. बाह्यवृत्ति (रेचक): इसमें सांस को बाहर छोड़ने पर जोर दिया जाता है। फेफड़ों से हवा पूरी तरह बाहर निकलती है, शरीर से विषाक्त पदार्थ बाहर जाते हैं और तनाव कम होता है।

2. आभ्यंतरवृत्ति (पूरक): इसमें गहरी और नियंत्रित सांस अंदर ली जाती है। इससे शरीर में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ती है, ऊर्जा का संचार होता है और मन एकाग्र रहता है।

3. स्तम्भवृत्ति (कुंभक): इसमें सांस को रोककर रखा जाता है। इसे अंतःकुंभक (सांस अंदर रोकना) और बाह्यकुंभक (सांस बाहर रोकना) में बांटा जाता है। कुंभक से प्राण शक्ति शरीर में संचित होती है, मन शांत होता है और ध्यान की गहराई बढ़ती है।

4. बाह्याभ्यन्तरविषयाक्षेपि (चतुर्थ): यह प्राणायाम का उच्चतम रूप है, जिसमें सांस का प्रवाह स्वाभाविक रूप से रुक जाता है। लंबे अभ्यास के बाद ही इसे सीखा जा सकता है। इस अवस्था में योगी सांस पर पूर्ण नियंत्रण प्राप्त करता है और गहन आध्यात्मिक अनुभव का अनुभव करता है।

इस प्रकार प्राणायाम के चारों प्रकार शारीरिक-मानसिक संतुलन और स्वास्थ्य के लिए अत्यंत लाभकारी हैं। (With inputs from IANS)

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