डर और कागज़ी बाधाएं रोक रही पाकिस्तानी महिलाओं का इलाज: रिपोर्ट

डर और कागज़ी प्रक्रियाओं की जटिलताएँ पाकिस्तान की महिलाओं को समय पर इलाज से वंचित कर रही हैं।

Update: 2026-01-13 11:45 GMT

इस्लामाबाद: पाकिस्तान में महिलाओं के लिए स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच में गरीबी से भी बड़ी चुनौतियां मौजूद हैं। एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, उचित पहचान दस्तावेज़ों की कमी, भय, सामाजिक हाशियाकरण और लैंगिक असमानता महिलाओं के इलाज में गंभीर बाधा बनी हुई हैं।

डॉन अख़बार में प्रकाशित लेख में वकील और इमकान वेलफेयर ऑर्गनाइजेशन की संस्थापक व सीईओ ताहेरा हसन ने बताया कि पाकिस्तान में पुरुषों की तुलना में महिलाओं के पास पहचान से जुड़े दस्तावेज़ कम होते हैं। इन्हें बनवाने या प्रस्तुत करने के लिए उन्हें अक्सर पुरुष परिजनों पर निर्भर रहना पड़ता है।

हसन ने कहा कि पहचान दस्तावेज़ों का अभाव, सख्त सामाजिक परंपराएं और संस्थागत शक्ति का असंतुलन मिलकर महिलाओं को सार्वजनिक सेवाओं से व्यवस्थित रूप से दूर कर देता है। उन्होंने सामुदायिक स्तर पर संचालित एक मैटरनिटी होम के अनुभव साझा करते हुए बताया कि महिलाओं का स्वास्थ्य सेवाओं से दूरी बनाना जागरूकता की कमी नहीं, बल्कि भय, प्रशासनिक उपेक्षा और ऐसे तंत्र से जुड़ी आर्थिक, सामाजिक व भावनात्मक कीमतों का परिणाम है, जो उनके लिए बना ही नहीं है।

रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि दस्तावेज़ न होने की स्थिति में महिलाओं को विशेष रूप से प्रसूति सेवाओं के दौरान अपमान झेलना पड़ता है। कई बार उन्हें इलाज से इनकार कर दिया जाता है या पूछताछ के नाम पर सार्वजनिक रूप से शर्मिंदा किया जाता है। ऐसी घटनाएं समुदायों में तेजी से फैलती हैं, जिससे औपचारिक स्वास्थ्य सेवाओं से सामूहिक दूरी बढ़ जाती है।

इसी कारण पारंपरिक दाइयों पर निर्भरता और घर पर प्रसव की प्रवृत्ति अब भी व्यापक है। कई महिलाओं के लिए संस्थागत स्वास्थ्य व्यवस्था सुरक्षा की बजाय दंडात्मक अनुभव बन जाती है। खासतौर पर पुरुष-प्रधान और भीड़भाड़ वाले सरकारी अस्पतालों में दुर्व्यवहार के डर से महिलाएं घर पर प्रसव को तरजीह देती हैं।

हसन के अनुसार, भले ही सेवाएं कागज़ों पर मुफ्त हों, लेकिन यात्रा खर्च, बार-बार रेफरल, जांच शुल्क और घरेलू या आय संबंधी काम से दूर रहने का समय—ये सभी मिलकर कम आय वाले परिवारों पर भारी बोझ डालते हैं। निजी स्वास्थ्य सेवाएं भी राहत नहीं देतीं, क्योंकि उनकी लागत अधिक है और प्रसव के अनावश्यक चिकित्साकरण को लेकर चिंताएं बढ़ रही हैं। कई परिवारों का कहना है कि सामान्य प्रसव संभव होने के बावजूद सिज़ेरियन ऑपरेशन के लिए दबाव डाला जाता है।

हसन ने स्पष्ट किया कि महिलाएं स्वास्थ्य सेवाओं से इसलिए नहीं बचतीं कि वे लापरवाह हैं या आधुनिक चिकित्सा के खिलाफ हैं, बल्कि इसलिए क्योंकि मौजूदा व्यवस्था उन्हें अपमान, आर्थिक दबाव और प्रशासनिक जोखिमों के सामने खड़ा कर देती है। उन्होंने जोर देकर कहा कि केवल जागरूकता अभियान पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि ऐसी स्वास्थ्य प्रणाली की जरूरत है जो दस्तावेज़ों को बाधा के रूप में पहचाने, लैंगिक असंतुलन को दूर करे और गरिमा को देखभाल का अनिवार्य हिस्सा बनाए। (With inputs from IANS)

Tags:    

Similar News