ICMR का बड़ा फैसला, अब 'भारतीय बॉडी टाइप' के आधार पर होंगे क्लिनिकल ट्रायल, बदल जाएगा इलाज का तरीका

भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) ने भारत की स्वास्थ्य प्रणाली में एक ऐतिहासिक बदलाव की शुरुआत की है.

Update: 2026-02-12 05:00 GMT

भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) ने भारत की स्वास्थ्य प्रणाली में एक ऐतिहासिक बदलाव की शुरुआत की है. अब देश में होने वाले क्लिनिकल ट्रायल केवल पश्चिमी देशों के डेटा पर निर्भर नहीं रहेंगे, बल्कि इन्हें भारतीय शरीर की बनावट (Body Type), ऐतिहासिक स्वास्थ्य डेटा और जीवनशैली के आधार पर प्राथमिकता दी जाएगी.

इस बदलाव की जरूरत क्यों पड़ी?

दशकों से भारत में उन उपचार प्रोटोकॉल का पालन किया जाता रहा है, जो मुख्य रूप से यूरोप और उत्तरी अमेरिका में किए गए परीक्षणों पर आधारित हैं. शोध बताते हैं कि जो दवाएं पश्चिमी लोगों पर प्रभावी हैं, वे भारतीयों पर अलग तरह से असर कर सकती हैं.

जेनेटिक्स और खान-पान- भारतीयों की आनुवंशिक संरचना, आहार और पर्यावरणीय कारक पश्चिमी देशों से काफी अलग हैं. 'थिन-फैट' (Thin-Fat) बॉडी टाइप-भारतीयों में अक्सर BMI सामान्य होता है, लेकिन शरीर के अंदर 'विसरल फैट' (पेट की चर्बी) अधिक होती है. यही कारण है कि भारतीयों में कम उम्र में ही इंसुलिन रेजिस्टेंस और डायबिटीज का खतरा बढ़ जाता है.

भारत में लाइफस्टाइल बीमारियों का संकट

ICMR के आंकड़े भारत की वर्तमान स्वास्थ्य स्थिति की एक डरावनी तस्वीर पेश करते हैं. डायबिटीज का विस्फोट-भारत में 10.1 करोड़ लोग डायबिटीज के साथ जी रहे हैं, जबकि 13.6 करोड़ लोग प्री-डायबिटिक स्टेज में हैं. गलत खान-पान-देश में कुल बीमारियों के बोझ का लगभग 56.4 प्रतिशत हिस्सा खराब जीवनशैली और अस्वास्थ्यकर आहार से जुड़ा है.समय से पहले बीमारी-विकसित देशों में जीवनशैली की बीमारियां 55 साल के बाद होती हैं, लेकिन भारत में ये 40-45 साल की उम्र में ही दस्तक दे रही हैं. मृत्यु दर-हृदय रोग और कैंसर जैसी गैर-संचारी बीमारियां (NCDs) अब देश में होने वाली कुल मौतों का 61 प्रतिशत हिस्सा हैं.

स्वदेशी साक्ष्यों पर जोर (Homegrown Evidence)

नए शासनादेश के तहत, ICMR कम से कम पांच अस्पतालों में 'मल्टीसेंटर ट्रायल' को प्रोत्साहित कर रहा है. इन अध्ययनों के लिए सरकार प्रति शोध 8 करोड़ रुपये तक की फंडिंग दे रही है.

इस पहल के मुख्य उद्देश्य

सटीक इलाज-भारतीय शरीर और हार्मोनल बदलावों के अनुरूप बेहतर दवाओं की पहचान करना है.सस्ती स्वास्थ्य सेवा-ऐसी थेरेपी विकसित करना जो भारतीय जेब के अनुकूल हों और सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली (Public Health System) के माध्यम से सुलभ हों. इनोवेशन-आधुनिक चिकित्सा के साथ-साथ आयुर्वेद जैसे एकीकृत दृष्टिकोणों को भी वैज्ञानिक आधार पर बढ़ावा देना.

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