रक्त शुद्धि से लेकर हृदय रोगों के जोखिम को कम करता है कालमेघ, सेवन से पहले जान लें सावधानियां

कालमेघ से रक्त शुद्धि और हृदय सुरक्षा मिलती है, सावधानी जरूरी।

Update: 2026-01-13 08:00 GMT

नई दिल्ली: आयुर्वेद में कई जड़ी-बूटियों का उल्लेख मिलता है, जो अपनी विशेषताओं के अनुसार शरीर को बीमारियों से बचाने और उन्हें ठीक करने में मदद करती हैं। इनमें से एक महत्वपूर्ण पत्तेदार पौधा है कालमेघ, जिसकी पत्तियां शरीर के हर अंग के लिए लाभकारी मानी जाती हैं।

कालमेघ कई सामान्य स्वास्थ्य समस्याओं में राहत प्रदान करता है, जैसे बुखार, रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाना, पेट की गैस, आंतों के कीड़े और कब्ज। आयुर्वेद में इसे संजीवनी कहा जाता है, क्योंकि यह कई प्रकार की बीमारियों में लाभकारी होता है। इसके पत्ते स्वाद में कड़वे और कसैले होते हैं, इसलिए इसे 'बिटर किंग' के नाम से भी जाना जाता है। यह पौधा मुख्यतः उत्तर भारत और बंगाल क्षेत्र में पाया जाता है।

कालमेघ में एन्ड्रोग्राफोलाइड की मात्रा अधिक होती है, जो इसे गुणों से भरपूर बनाती है। शरीर की सभी बीमारियों की जड़ रक्त माना गया है। यदि रक्त अशुद्ध हो, तो फ्लू, वायरल संक्रमण और मलेरिया जैसी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं और गंभीर मामलों में अंग ठीक से काम नहीं करते। ऐसे में कालमेघ के पत्तों का काढ़ा रक्त को शुद्ध करने में मदद करता है।

इसके अलावा, कालमेघ में एंटी-डायबेटिक गुण पाए जाते हैं, जो ब्लड शुगर को नियंत्रित करने में सहायक हैं। शोध बताते हैं कि मधुमेह रोगियों के लिए यह उपयोगी हो सकता है। कालमेघ के पत्तों का काढ़ा पीने से रक्त में शर्करा संतुलित रहती है।

त्वचा संबंधी समस्याओं में भी कालमेघ लाभकारी है। अगर पित और कफ दोष असंतुलित हों, तो मुंहासे, फोड़े-फुंसी, खुजली और त्वचा संक्रमण जैसी परेशानियां बनी रहती हैं। ऐसे मामलों में कालमेघ के पत्तों का पेस्ट बनाकर लगाने से आराम मिलता है।

कालमेघ में एंटी-क्लॉटिंग गुण भी मौजूद हैं, जो रक्त प्रवाह को बेहतर बनाते हैं और कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित करते हैं। यह लंबे समय तक रहने वाले बुखार, मलेरिया, टायफाइड और वायरल फीवर में शरीर को जल्दी रिकवर करने में मदद करता है।

हालांकि, कुछ सावधानियां जरूरी हैं। यदि कालमेघ के सेवन के बाद पेट दर्द, चक्कर या उल्टी जैसी परेशानी हो, तो इसका सेवन न करें। गर्भवती महिलाएं भी इसका सेवन न करें। (With inputs from IANS)

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