राज्यसभा में फुट रिफ्लेक्सोलॉजी का विषय, आयुष में शामिल करने की मांग

राज्यसभा में फुट रिफ्लेक्सोलॉजी को आयुष में शामिल करने की मांग उठाई गई।

Update: 2026-02-07 06:30 GMT

नई दिल्ली: राज्यसभा की कार्यवाही के दौरान शुक्रवार को मनोनीत सांसद सुधा मूर्ति ने स्वास्थ्य के एक महत्वपूर्ण लेकिन अक्सर नजरअंदाज किए जाने वाले विषय पर सदन का ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने फुट रिफ्लेक्सोलॉजी, यानी पैरों के संवेदनशील बिंदुओं के माध्यम से उपचार, को एक प्रभावी, गैर-आक्रामक और प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति बताते हुए इसे भारत की आयुष प्रणाली में शामिल करने का सुझाव दिया।

सुधा मूर्ति ने सदन में कहा कि मानव शरीर का पैर अक्सर उपेक्षित रह जाता है, जबकि इसके संवेदनशील बिंदुओं को सही तरीके से उत्तेजित करने से दर्द में कमी लाई जा सकती है, तनाव कम होता है और शरीर को गहन राहत मिलती है। उन्होंने बताया कि दक्षिण-पूर्व एशिया के कई देशों जैसे थाईलैंड, इंडोनेशिया, लाओस और वियतनाम में फुट रिफ्लेक्सोलॉजी व्यापक रूप से अपनाई जाती है और वहां इसे एक प्रभावी उपचार पद्धति के रूप में माना जाता है।

उन्होंने भारतीय पारंपरिक मालिश पद्धतियों का उदाहरण देते हुए कहा कि जिस तरह भारत की पारंपरिक मालिश विश्वभर में प्रसिद्ध है और विदेशी नागरिक इसे अपनाने के लिए भारत आते हैं, ठीक उसी तरह दक्षिण-पूर्व एशिया में लोग फुट रिफ्लेक्सोलॉजी के लिए जाते हैं।

सुधा मूर्ति ने कहा कि यह उपचार पूरी तरह से गैर-आक्रामक, सुरक्षित और विशेष रूप से बुजुर्गों के लिए लाभकारी है। उन्होंने सरकार का ध्यान इस ओर भी दिलाया कि आयुष मंत्रालय पहले से ही हर्बल, प्राकृतिक और समय-परीक्षित पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों को अपनाने में अग्रणी रहा है। इसी तर्ज पर फुट रिफ्लेक्सोलॉजी को भी वैज्ञानिक प्रशिक्षण, सुरक्षा मानकों और समुचित ज्ञान के साथ आयुष अस्पतालों में शामिल किया जा सकता है।

सांसद ने मधुमेह जैसी गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं पर भी विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा कि मधुमेह रोगियों के पैरों में संवेदनशीलता अधिक होती है और समय पर देखभाल न मिलने पर गंभीर जटिलताएं उत्पन्न हो सकती हैं। इसलिए हर अस्पताल में फुट रिफ्लेक्सोलॉजी और फुट केयर के लिए विशेष विभाग होना चाहिए, जिससे दर्द कम किया जा सके और शुरुआती स्तर पर ही समस्याओं की पहचान हो सके।

सुधा मूर्ति ने जोर देते हुए कहा कि इस प्रकार की व्यवस्था डायबिटीज से जुड़ी समस्याओं में प्रारंभिक हस्तक्षेप को संभव बनाएगी, रोग की जड़ को समझने में मदद करेगी और मरीजों को समय पर उचित उपचार उपलब्ध कराएगी। उन्होंने इसे शरीर के एक उपेक्षित लेकिन महत्वपूर्ण हिस्से से जुड़ा मामला बताते हुए सरकार से आग्रह किया कि इसे स्वास्थ्य नीति में शामिल किया जाए, ताकि लोगों को सही दिशा में उपचार की सुविधा मिल सके। (With inputs from IANS)

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