30 के बाद किडनी का स्वास्थ्य, भारतीयों को स्क्रीनिंग की जरूरत क्यों है - डॉ सशी किरण ए

भारत में जीवनशैली से जुड़ी बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं, 30 वर्ष की उम्र से किडनी की जांच शुरू करना जरूरी हो जाता है.

Update: 2026-03-18 06:00 GMT

किडनी का स्वास्थ्य अक्सर तब तक नजरअंदाज किया जाता है जब तक लक्षण गंभीर नहीं हो जाते, जबकि क्रॉनिक किडनी डिज़ीज़ (CKD) भारत में तेजी से बढ़ती एक बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या बनती जा रही है. कई अन्य बीमारियों के विपरीत, किडनी रोग वर्षों तक बिना किसी स्पष्ट लक्षण के धीरे-धीरे बढ़ सकता है. जब तक लक्षण दिखाई देते हैं, तब तक किडनी को काफी नुकसान हो चुका होता है. यही कारण है कि भारत जैसे देश में, जहां जीवनशैली से जुड़ी बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं, 30 वर्ष की उम्र से किडनी की नियमित जांच शुरू करना बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है.

भारत में किडनी रोग का बढ़ता बोझ

भारत में क्रॉनिक किडनी डिज़ीज़ के मामलों में चिंताजनक वृद्धि देखी जा रही है. हालिया शोध के अनुसार, देश में CKD का प्रसार 2011–2017 के बीच लगभग 11% था, जो 2018–2023 के बीच बढ़कर 16% से अधिक हो गया है, विशेष रूप से 15 वर्ष और उससे अधिक आयु के लोगों में.इस वृद्धि के पीछे कई कारण हैं. तेज़ी से हो रहा शहरीकरण, बैठकर काम करने वाली जीवनशैली, अस्वस्थ खान-पान की आदतें और बढ़ती मोटापे की समस्या किडनी पर अतिरिक्त दबाव डाल रही हैं. इसके अलावा भारत में डायबिटीज़ और हाई ब्लड प्रेशर से पीड़ित लोगों की संख्या भी बहुत अधिक है, जो किडनी को नुकसान पहुँचाने वाले सबसे बड़े जोखिम कारक हैं. चिंता की बात यह है कि किडनी रोग शुरुआती चरणों में आमतौर पर कोई लक्षण नहीं देता। इसलिए कई लोग सामान्य जीवन जीते रहते हैं, जबकि उनकी किडनी की कार्यक्षमता धीरे-धीरे कम होती रहती है। यही वजह है कि समय पर जाँच और स्क्रीनिंग अत्यंत जरूरत है.

30 वर्ष की आयु के बाद स्क्रीनिंग क्यों ज़रूरी

पहले किडनी रोग को मुख्य रूप से बुज़ुर्गों की समस्या माना जाता था, लेकिन अब यह धारणा बदल रही है. आजकल डॉक्टर 30 और 40 वर्ष की उम्र के लोगों में भी किडनी संबंधी समस्याएँ अधिक देख रहे हैं। इसका मुख्य कारण है कम उम्र में होने वाली डायबिटीज़, हाई ब्लड प्रेशर, मोटापा और मेटाबॉलिक विकार. जब ये स्थितियां लंबे समय तक नियंत्रित नहीं रहतीं, तो ये धीरे-धीरे किडनी की नाजुक रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुँचाती हैं। इससे समय के साथ किडनी की शरीर से अपशिष्ट पदार्थ और अतिरिक्त तरल पदार्थ को फिल्टर करने की क्षमता कम हो जाती है.

30 वर्ष की उम्र के बाद नियमित जाँच से शुरुआती चरण में किडनी की समस्या का पता लगाया जा सकता है। सीरम क्रिएटिनिन, अनुमानित ग्लोमेरुलर फिल्ट्रेशन रेट (eGFR) और यूरिन एल्ब्यूमिन टेस्ट जैसे सरल परीक्षण शुरुआती असामान्यताओं का पता लगाने में मदद करते हैं। प्रारंभिक पहचान होने पर डॉक्टर जीवनशैली में बदलाव, दवाइयों और अन्य बीमारियों के बेहतर नियंत्रण के माध्यम से बीमारी की प्रगति को धीमा कर सकते हैं.

किडनी को नुकसान पहुंचाने वाले सामान्य जोखिम कारक कई जीवनशैली और चिकित्सीय स्थितियां क्रॉनिक किडनी डिज़ीज़ का खतरा बढ़ाती हैं. इनमें डायबिटीज़ और हाई ब्लड प्रेशर सबसे प्रमुख कारण हैं और भारत में CKD के अधिकांश मामलों के लिए जिम्मेदार माने जाते हैं. इसके अलावा मोटापा, अधिक नमक का सेवन, धूम्रपान, दर्द निवारक दवाओं का अत्यधिक उपयोग और किडनी रोग का पारिवारिक इतिहास भी जोखिम बढ़ाते हैं। कुछ क्षेत्रों में दूषित पानी के स्रोत और लगातार डिहाइड्रेशन, खासकर कृषि मजदूरों में, भी किडनी को नुकसान पहुँचा सकते हैं.

समय पर पहचान का महत्व

CKD की सबसे बड़ी चुनौती इसका मौन रूप से बढ़ना है. शुरुआती चरणों में मरीजों को कोई खास लक्षण महसूस नहीं होते. जब पैरों में सूजन, अत्यधिक थकान, पेशाब में बदलाव या भूख कम लगना जैसे लक्षण दिखाई देते हैं, तब तक किडनी की कार्यक्षमता काफी कम हो चुकी होती है. समय पर पहचान से उपचार के परिणाम बेहतर हो सकते हैं. सही समय पर निदान होने पर डॉक्टर ब्लड प्रेशर और ब्लड शुगर का बेहतर नियंत्रण, आहार में बदलाव और किडनी की रक्षा करने वाली दवाओं के माध्यम से रोग की प्रगति को धीमा कर सकते हैं. कई मामलों में इससे डायलिसिस या किडनी प्रत्यारोपण की आवश्यकता को लंबे समय तक टाला जा सकता है.

जीवनशैली में बदलाव से किडनी की सुरक्षा

चिकित्सीय जांच के साथ-साथ रोकथाम भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। स्वस्थ जीवनशैली अपनाने से किडनी रोग के जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है. इसके लिए ब्लड प्रेशर और ब्लड शुगर को नियंत्रित रखना, स्वस्थ वजन बनाए रखना, पर्याप्त पानी पीना, नमक का सेवन सीमित करना और बिना डॉक्टर की सलाह के दर्द निवारक दवाओं का अत्यधिक उपयोग न करना जरूरी है। नियमित व्यायाम और फलों, सब्जियों तथा साबुत अनाज से भरपूर संतुलित आहार भी किडनी के समग्र स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने में मदद करता है.

जागरूकता की जरूरत

भारत में किडनी रोग के मामलों में वृद्धि के बावजूद इसके बारे में जागरूकता अभी भी कम है. अधिकांश लोग तब ही किडनी की जांच करवाते हैं जब लक्षण दिखाई देने लगते हैं या बीमारी काफी आगे बढ़ चुकी होती है. इसलिए विशेष रूप से युवाओं में किडनी स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ाना बेहद आवश्यक है. 30 वर्ष की उम्र के बाद नियमित स्क्रीनिंग, खासकर उन लोगों के लिए जिनको डायबिटीज़, हाई ब्लड प्रेशर या किडनी रोग का पारिवारिक इतिहास है, शुरुआती पहचान और रोकथाम में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है. अंततः किडनी के स्वास्थ्य की रक्षा केवल बीमारी का इलाज करने तक सीमित नहीं है, बल्कि जोखिमों को समय रहते पहचानने और निवारक कदम उठाने से भी जुड़ी है. समय पर स्क्रीनिंग, स्वस्थ जीवनशैली और बेहतर जागरूकता के माध्यम से क्रॉनिक किडनी डिज़ीज के कई मामलों को रोका या शुरुआती चरण में ही प्रभावी ढंग से नियंत्रित किया जा सकता है.

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