आपका भोजन सत्व, रजस या तमस में से कौन सा है? जानें सिद्ध चिकित्सा

सात्विक, राजसिक और तामसिक भोजन से बदलता है शरीर और मन का संतुलन।
नई दिल्ली: पुरानी कहावत है, "जैसा अन्न, वैसा मन और वैसी ही सेहत।" अर्थात् हम जो खाते हैं, उसका प्रभाव हमारे शरीर और मानसिक स्थिति दोनों पर पड़ता है। प्राचीन सिद्ध चिकित्सा प्रणाली भी इसी दृष्टिकोण पर आधारित है। इस पद्धति के अनुसार भोजन को तीन प्रकारों में बांटा गया है, जो हमारे तीन गुणों—सत्व (उत्तम और शुद्ध), रजस (सक्रिय और उत्तेजक) और तमस (निष्क्रिय और सुस्त)—पर असर डालते हैं।
आयुष मंत्रालय के अनुसार, सही भोजन का चयन करके हम मानसिक शांति, शारीरिक स्वास्थ्य और जीवन में संतुलन बनाए रख सकते हैं। सिद्ध चिकित्सा में भोजन केवल पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि शरीर और मन की दवा भी माना जाता है।
सत्व या सात्विक भोजन वह है जो शुद्ध, ताजा और प्राकृतिक होता है, जैसे फल, सब्जियां, अनाज, दूध और हल्के मसाले। यह भोजन मन को शांत करता है, शरीर को पोषण देता है और एकाग्रता बढ़ाता है। नियमित सेवन से व्यक्ति में सकारात्मकता, संतुलन और मानसिक स्पष्टता आती है।
रजस या राजसिक भोजन सक्रियता बढ़ाने वाला होता है, जिसमें मसालेदार, तीखा, नमकीन या उत्तेजक चीजें शामिल होती हैं, जैसे प्याज, लहसुन, मिर्च, चाय, कॉफी और तले हुए पदार्थ। यह ऊर्जा देता है लेकिन अधिक सेवन से चिड़चिड़ापन, बेचैनी या आक्रामकता हो सकती है। सिद्ध प्रणाली में इसे संतुलित मात्रा में लेने की सलाह दी जाती है।
तमस या तामसिक भोजन निष्क्रिय गुण बढ़ाता है। इसमें भारी, बासी, प्रोसेस्ड या अधिक मांसाहारी भोजन शामिल है, जैसे बचा हुआ खाना, शराब और अधिक तला हुआ भोजन। यह सुस्ती, आलस्य और मानसिक भ्रम पैदा करता है। सिद्ध चिकित्सा में इसे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक माना गया है और कम से कम सेवन करने की सिफारिश की जाती है।
विशेषज्ञों का सुझाव है कि अपनी प्रकृति के अनुसार भोजन चुनें और सात्विक आहार को प्राथमिकता दें। ऐसा भोजन रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है, मानसिक शांति देता है और आज के तनावपूर्ण जीवन में स्वस्थ रहने में मदद करता है। (With inputs from IANS)


