AIIMS एक्सपर्ट की चेतावनी: लाइफस्टाइल और पर्यावरण के कारण बढ़ रहीं ऑटोइम्यून बीमारियां

AIIMS के विशेषज्ञों ने देश में तेजी से बढ़ रही ऑटोइम्यून बीमारियों को लेकर गंभीर चिंता जताई है। AIIMS की सीनियर डॉक्टर डॉ. उमा कुमार के अनुसार, बदलती जीवनशैली और पर्यावरण से जुड़े कारणों की वजह से इन बीमारियों के मामले लगातार बढ़ रहे हैं. ऑटोइम्यून बीमारी वह स्थिति होती है, जिसमें शरीर की इम्यून सिस्टम बाहरी संक्रमण से लड़ने के बजाय अपने ही स्वस्थ अंगों और कोशिकाओं पर हमला करने लगती है.
क्या होता है ऑटोइम्यून डिजीज
डॉ. कुमार बताती हैं कि ऑटोइम्यून डिज़ीज़ के अंतर्गत करीब 60 तरह की बीमारियां आती हैं, जिनमें रूमेटॉयड आर्थराइटिस, ल्यूपस, डायबिटीज टाइप-1, थायरॉयड से जुड़ी बीमारियां और मल्टीपल स्क्लेरोसिस जैसी गंभीर समस्याएं शामिल हैं.इन बीमारियों की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इनके लक्षण जल्दी पकड़ में नहीं आते। कई बार मरीज लंबे समय तक जोड़ों के दर्द, थकान, त्वचा पर चकत्ते, बालों का झड़ना या बार-बार बीमार पड़ने जैसे लक्षणों को नजरअंदाज करता रहता है। जब तक बीमारी का पता चलता है, तब तक स्थिति काफी आगे बढ़ चुकी होती है.
क्या इस बीमारी का कारण
ऐसे में कई मरीजों को जीवन भर दवाइयों पर निर्भर रहना पड़ता है. डॉ. उमा कुमार के मुताबिक, ऑटोइम्यून बीमारियों के बढ़ने के पीछे कई कारण जिम्मेदार हैं. इनमें वायु प्रदूषण, केमिकल पेस्टिसाइड्स का असर, खान-पान में बदलाव, लगातार तनाव, नींद की कमी और शारीरिक गतिविधियों की कमी प्रमुख हैं. इसके अलावा विटामिन D की कमी भी एक बड़ा कारण मानी जा रही है, जो आजकल शहरी और ग्रामीण दोनों इलाकों में आम हो गई है.
डॉ. कुमार ने एक अहम बात की ओर ध्यान दिलाया कि आजकल बच्चों को बहुत कम उम्र से ही पूरी तरह फिल्टर किया हुआ पानी दिया जा रहा है। इससे शरीर की इम्यून सिस्टम को प्राकृतिक बैक्टीरिया और वायरस से लड़ने का मौका नहीं मिल पाता, जिससे आगे चलकर इम्यून से जुड़ी समस्याएं बढ़ सकती हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि ऑटोइम्यून बीमारियों से बचाव के लिए जागरूकता सबसे ज़रूरी हथियार है. समय पर जांच, संतुलित आहार, धूप में पर्याप्त समय बिताना, नियमित व्यायाम और तनाव से दूरी बनाकर इन बीमारियों के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है.


