जैसे-जैसे सर्दियों में तापमान गिरता है, भारत सहित दुनिया भर में स्वास्थ्य विशेषज्ञ स्ट्रोक के मामलों में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज कर रहे हैं। यह मौसमी वृद्धि संयोग नहीं है, बल्कि शारीरिक प्रतिक्रियाओं, पर्यावरणीय दबावों और जीवनशैली में होने वाले बदलावों के जटिल मेल का परिणाम है, जो ठंड के महीनों में स्ट्रोक के खतरे को बढ़ा देता है।

वासोकंस्ट्रिक्शन और बढ़ा हुआ रक्तचाप

ठंड के संपर्क में आने पर शरीर रक्त वाहिकाओं को संकुचित कर देता है, ताकि गर्मी बनी रहे। यह प्रक्रिया सुरक्षात्मक जरूर है, लेकिन इससे रक्तचाप बढ़ जाता है, जो इस्केमिक और हेमरेजिक दोनों प्रकार के स्ट्रोक का एक बड़ा जोखिम कारक है। बढ़ा हुआ दबाव रक्त वाहिकाओं की दीवारों पर अतिरिक्त तनाव डालता है, जिससे उनके क्षतिग्रस्त होने या फटने की आशंका बढ़ जाती है।

रक्त की गाढ़ापन और थक्का बनने का खतरा

ठंड के मौसम में खून अधिक गाढ़ा हो जाता है, जिससे उसमें थक्का बनने की प्रवृत्ति बढ़ जाती है। धीमा रक्त प्रवाह और बढ़ा हुआ थक्का बनने का जोखिम मस्तिष्क को रक्त पहुंचाने वाली नलिकाओं में अवरोध पैदा कर सकता है, जिससे इस्केमिक स्ट्रोक हो सकता है।

शारीरिक गतिविधि में कमी और जीवनशैली में बदलाव

सर्दियों में बाहर की गतिविधियां कम हो जाती हैं, जिससे लोग अधिक निष्क्रिय जीवनशैली अपनाने लगते हैं। इससे वजन बढ़ना, रक्तचाप, कोलेस्ट्रॉल और ब्लड शुगर का असंतुलन हो सकता है, जो सभी स्ट्रोक के प्रमुख जोखिम कारक हैं। इसके अलावा, सर्दियों में अधिक कैलोरी और नमक युक्त भोजन का सेवन भी हृदय और रक्त वाहिकाओं पर अतिरिक्त दबाव डालता है।

सुबह के समय और अत्यधिक ठंड का प्रभाव

अध्ययनों से पता चलता है कि सर्दियों में स्ट्रोक के मामले अक्सर सुबह के समय अधिक होते हैं, जब तापमान सबसे कम होता है और जागने के बाद रक्तचाप स्वाभाविक रूप से बढ़ जाता है, जिससे रक्त वाहिकाओं पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है।

छिपे हुए कारण: निर्जलीकरण और संक्रमण

• सर्दियों में प्यास कम लगने के कारण लोग कम पानी पीते हैं, जिससे शरीर में पानी की कमी हो सकती है। इससे खून और अधिक गाढ़ा हो जाता है और थक्का बनने का खतरा बढ़ जाता है।

• फ्लू और अन्य मौसमी संक्रमण सर्दियों में अधिक होते हैं। ये शरीर में सूजन पैदा कर सकते हैं, जिससे रक्त वाहिकाओं में जमा फैटी पदार्थ अस्थिर हो जाते हैं और थक्का बनने की संभावना बढ़ जाती है।

पुरानी बीमारियों वाले लोगों में अधिक खतरा

• हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, हृदय रोग या पहले स्ट्रोक झेल चुके लोग सर्दियों में अधिक संवेदनशील होते हैं। ठंड का तनाव और दवाओं में लापरवाही उन्हें गंभीर स्थिति में पहुंचा सकती है।

• ठंड के महीनों में स्ट्रोक के मामले अक्सर सुबह के समय अधिक होते हैं, जब शरीर का तापमान कम और रक्तचाप अधिक होता है।

वर्तमान मानक उपचार

इस्केमिक स्ट्रोक का वर्तमान उपचार मुख्य रूप से या तो थक्के को सर्जरी द्वारा निकालने या थक्के को घोलने वाली दवाओं (थ्रोम्बोलाइटिक्स) के उपयोग पर आधारित है। हालांकि, अल्टेप्लेस और टेनेक्टेप्लेस जैसी दवाएं केवल 4.5 घंटे की सीमित समयावधि में ही प्रभावी होती हैं। इस संकुचित समय सीमा के कारण केवल 10–15% मरीज ही समय पर इलाज प्राप्त कर पाते हैं।

सोवाटेलटाइड: इस्केमिक स्ट्रोक के इलाज में नई उम्मीद

सोवाटेलटाइड एक नई दवा है, जिसे हाल ही में भारत में तीव्र इस्केमिक स्ट्रोक के उपचार के लिए मंजूरी मिली है। यह दवा मस्तिष्क में एंडोथेलिन-बी (ETB) रिसेप्टर्स को सक्रिय करती है, जिससे रक्त वाहिकाओं की मरम्मत और तंत्रिका कोशिकाओं की रिकवरी में मदद मिलती है।

क्लिनिकल अध्ययनों से संकेत मिलता है कि यदि सोवाटेलटाइड का उपचार पहले 24 घंटों के भीतर शुरू किया जाए, तो यह न्यूरोलॉजिकल परिणामों में सुधार कर सकती है और अधिक मरीजों को स्ट्रोक के बाद आत्मनिर्भर जीवन जीने में मदद कर सकती है, साथ ही इसकी सुरक्षा प्रोफाइल भी अनुकूल पाई गई है।

जनता के लिए महत्वपूर्ण बचाव उपाय

• शरीर को गर्म रखें, लेकिन अचानक तापमान परिवर्तन से बचें। सर्दियों में रक्तचाप, शुगर और कोलेस्ट्रॉल की नियमित जांच और नियंत्रण करें।

• घर के अंदर भी सक्रिय रहें, संतुलित और कम नमक वाला आहार लें, पर्याप्त पानी पिएं और निर्धारित दवाएं या स्वास्थ्य जांच न छोड़ें।

• स्ट्रोक के चेतावनी संकेतों को FAST के जरिए पहचानें—चेहरे का टेढ़ा होना (Face), बांह में कमजोरी (Arm), बोलने में दिक्कत (Speech) और समय पर आपात सेवाओं को कॉल करना (Time)। तुरंत स्ट्रोक-सक्षम अस्पताल पहुंचना मस्तिष्क को होने वाले नुकसान को कम कर सकता है और विकलांगता से बचा सकता है।

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Dr Anil Gulati
Dr Anil Gulati

Prof. (Dr) Anil Gulati, founder and CEO of Pharmazz, Inc., is a distinguished academician and biopharmaceutical entrepreneur. With over 300 publications and 60 patents, he developed sovateltide and centhaquine, bridging research and innovative therapies for stroke and critical blood loss.