इसके अलावा, हर लैब में जांच का एक जैसा स्तर अभी नहीं है और लागत भी कई मरीजों के लिए चुनौती बनी हुई है, खासकर छोटे शहरों में। इसलिए डॉक्टर हमेशा इस जांच के नतीजों को मरीज की पूरी मेडिकल स्थिति, स्कैन और अन्य रिपोर्ट्स के साथ मिलाकर ही समझते हैं। यह पारंपरिक जांच की जगह लेने के बजाय उसे और मजबूत बनाती है।

आगे क्या बदलने वाला है? मरीजों के लिए क्या मतलब है

कैंसर जांच का भविष्य अब सिर्फ एक टेस्ट पर निर्भर नहीं रहेगा। टिश्यू बायोप्सी अभी भी जरूरी है, लेकिन लिक्विड बायोप्सी ने जांच को ज्यादा आसान, कम दर्द वाली और मरीज-अनुकूल बना दिया है। आज ctDNA हर किसी के लिए रूटीन स्क्रीनिंग नहीं है, लेकिन सही मरीजों में यह बीमारी को जल्दी पकड़ने, इलाज के बाद छिपे कैंसर का पता लगाने और बीमारी पर लगातार नजर रखने में बहुत मदद कर रहा है।

अच्छी खबर यह है कि जैसे-जैसे तकनीक सस्ती और ज्यादा उपलब्ध होगी, वैसे-वैसे मरीजों को बार-बार दर्दनाक जांच की जरूरत कम पड़ेगी और इलाज ज्यादा व्यक्तिगत और समय पर हो सकेगा। आसान शब्दों में—कैंसर की जांच अब मरीज के लिए पहले से ज्यादा सरल, सुरक्षित और समझदारी भरी होती जा रही है।

भारत में कैंसर की पहचान लंबे समय तक टिश्यू बायोप्सी, इमेजिंग और लक्षणों के आधार पर होती रही है—अक्सर तब, जब बीमारी के संकेत सामने आने लगते हैं। ये तरीके आज भी महत्वपूर्ण हैं, लेकिन इनके साथ कुछ चुनौतियाँ जुड़ी हैं, जैसे दर्दनाक प्रक्रिया, जांच में देरी, शरीर के अंदर गहरे ट्यूमर तक पहुँचना मुश्किल होना और बार-बार बायोप्सी करना आसान न होना।

पिछले कुछ वर्षों में कैंसर जांच में कम दर्द वाली तकनीकों की ओर बदलाव तेज हुआ है, और 2026 तक यह बदलाव भारत में कैंसर देखभाल को बेहतर बनाने लगा है।

कम दर्द वाली नई जांच तकनीकें

हाई-रेजोल्यूशन MRI, नए ट्रेसर के साथ PET-CT और बेहतर एंडोस्कोपिक तकनीकों ने जांच को आसान और सुरक्षित बनाया है। लेकिन सबसे बड़ा बदलाव लिक्विड बायोप्सी—यानी खून की जांच से कैंसर से जुड़ी जानकारी निकालना—के बढ़ते उपयोग से आया है। खासकर सर्कुलेटिंग ट्यूमर डीएनए (ctDNA) जांच ने कैंसर की पहचान और निगरानी के तरीके को बदलना शुरू किया है।

लिक्विड बायोप्सी क्या है? आसान भाषा में समझें

लिक्विड बायोप्सी में शरीर के तरल पदार्थ, खासकर खून में मौजूद ट्यूमर से जुड़े तत्वों की पहचान की जाती है। इसमें सर्कुलेटिंग ट्यूमर डीएनए, ट्यूमर सेल्स, RNA और अन्य छोटे कण शामिल हो सकते हैं। इनमें ctDNA सबसे ज्यादा उपयोगी और भरोसेमंद माना जाता है।

कैंसर कोशिकाएँ अपने डीएनए के छोटे-छोटे टुकड़े खून में छोड़ती हैं। इन टुकड़ों में ट्यूमर से जुड़ी जेनेटिक जानकारी होती है, जो बीमारी की वास्तविक स्थिति दिखाती है। टिश्यू बायोप्सी के विपरीत, इसमें सर्जरी, एनेस्थीसिया या अस्पताल में भर्ती होने की जरूरत नहीं होती। साथ ही, ctDNA का जीवनकाल कम होने के कारण यह ट्यूमर की ताजा स्थिति बताता है।

2026 में भारत में ctDNA का उपयोग कहाँ हो रहा है?

आज भारत के बड़े कैंसर सेंटरों में लिक्विड बायोप्सी धीरे-धीरे सामान्य प्रैक्टिस का हिस्सा बन रही है।

1. उच्च जोखिम वाले लोगों में शुरुआती पहचान

भारत में सामान्य कैंसर स्क्रीनिंग अभी भी मैमोग्राफी, पैप स्मीयर और कोलोनोस्कोपी जैसी पारंपरिक जांचों पर आधारित है। लेकिन जिन लोगों में कैंसर का जोखिम ज्यादा है—जैसे मजबूत पारिवारिक इतिहास, आनुवंशिक कारण या पहले कैंसर हो चुका हो—उनमें ctDNA जांच से शुरुआती पहचान की कोशिश की जा रही है।

कुछ ब्लड टेस्ट कई तरह के कैंसर का शुरुआती संकेत देने में मदद कर रहे हैं, खासकर अग्न्याशय, अंडाशय और पित्त नली के कैंसर जैसे मामलों में, जहाँ नियमित स्क्रीनिंग सीमित है। हालांकि लागत और उपलब्धता के कारण इसे अभी चुनिंदा मरीजों तक ही सीमित रखा गया है।

2. इलाज के बाद छिपे कैंसर (MRD) का पता लगाना

कई बार स्कैन में मरीज कैंसर-मुक्त दिखता है, लेकिन शरीर में बहुत छोटे स्तर पर बीमारी मौजूद रह सकती है। इसे मिनिमल रेजिडुअल डिजीज (MRD) कहते हैं।

कोलोरेक्टल, ब्रेस्ट, फेफड़े और खून के कैंसर में इलाज के बाद ctDNA पॉजिटिव होना भविष्य में कैंसर लौटने का संकेत हो सकता है। अब डॉक्टर इस जांच से जोखिम समझकर फॉलो-अप या अतिरिक्त इलाज की योजना बना रहे हैं।

3. जब टिश्यू बायोप्सी संभव न हो

कई मरीजों में पर्याप्त टिश्यू लेना मुश्किल होता है—जैसे गंभीर हालत, गहरे ट्यूमर या कमजोर स्वास्थ्य के कारण। ऐसे मामलों में लिक्विड बायोप्सी एक सुरक्षित विकल्प बन रही है।

फेफड़े, ब्रेस्ट, कोलोरेक्टल और कुछ दुर्लभ कैंसर में ctDNA जांच से जरूरी जेनेटिक बदलाव पहचानकर सही टार्गेटेड इलाज शुरू करने में मदद मिलती है।

4. इलाज की निगरानी और दवा प्रतिरोध का पता

बार-बार टिश्यू बायोप्सी करना संभव नहीं होता। ऐसे में ctDNA की नियमित जांच से इलाज का असर और दवा के प्रति प्रतिरोध का पता जल्दी चल जाता है। कई बार ctDNA का स्तर बढ़ना स्कैन से पहले ही बीमारी के बढ़ने का संकेत दे देता है।

लिक्विड बायोप्सी के फायदे के साथ कुछ जरूरी सीमाएँ भी समझें

लिक्विड बायोप्सी कई मायनों में आसान और कम दर्द वाली जांच है, लेकिन यह पूरी तरह परफेक्ट नहीं है। कुछ मरीजों में ट्यूमर बहुत छोटा होता है या खून में डीएनए कम मात्रा में निकलता है, जिससे रिपोर्ट नेगेटिव आ सकती है, जबकि बीमारी मौजूद हो। उम्र बढ़ने के साथ शरीर में होने वाले कुछ सामान्य जेनेटिक बदलाव कभी-कभी गलत पॉजिटिव रिपोर्ट भी दे सकते हैं।

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Dr Jeyhan Dhabhar
Dr Jeyhan Dhabhar

Dr Jeyhan Dhabhar is a Consultant Medical Oncologist with MBBS, MD, and DrNB in Medical Oncology and 5 years of experience. He specializes in precision oncology and provides expert care for lymphomas, breast, ovarian, lung, colon, and stomach cancers, focusing on personalized treatment for optimal outcomes.