नई दिल्ली: आवाज हमारी पहचान होती है, जो हमें दूसरों से अलग बनाती है। कुछ आवाजें कानों में मधुर घुल जाती हैं, जबकि कुछ कर्कश लगती हैं। आम धारणा है कि आवाज सिर्फ गले से जुड़ी होती है, लेकिन आयुर्वेद के अनुसार यह पेट, श्वास नली और मानसिक स्थिति से भी प्रभावित होती है।

आयुर्वेद के अनुसार बार-बार गला बैठना या आवाज फंसना मौसम का असर नहीं, बल्कि बीमारी का संकेत हो सकता है। यह गले और आवाज से जुड़ी समस्याओं में वात और पित्त के असंतुलन से जुड़ा माना गया है। जब ये असंतुलन बने रहते हैं, तो आवाज भारी या बेसुरी हो जाती है और गले में खिचखिच रहती है।

रोजमर्रा की आदतें भी गले की सेहत पर असर डालती हैं। जोर से चिल्लाना, ऊंची आवाज में बात करना, बहुत ठंडा पानी या कोल्ड ड्रिंक पीना, पेट की सफाई ठीक न होना और तंबाकू का सेवन गले की परेशानियों को बढ़ा सकते हैं। आयुर्वेद में गले को स्वस्थ और आवाज को कोमल बनाए रखने के कई उपाय बताए गए हैं।

पहला, दिन की शुरुआत गर्म पानी से करें और पूरे दिन हल्का गर्म पानी पीने की आदत बनाएं। इससे गले की सूजन और संक्रमण का खतरा कम होता है। सुबह का समय गले के लिए संवेदनशील होता है, इसलिए लंबे समय तक फोन पर बात करने या गले पर जोर डालने से बचें।

दूसरा, श्वास से जुड़े अभ्यास करें। डायाफ्रामिक श्वास, पर्ड-लिप ब्रीदिंग, कपालभाति और भस्त्रिका जैसी तकनीकें पेट और गले दोनों के लिए फायदेमंद हैं। ये मस्तिष्क में ऑक्सीजन के प्रवाह को बढ़ाते हैं और रक्त संचार को सुधारते हैं।

तीसरा, कुछ घरेलू उपाय अपनाएं। सुबह शहद का सेवन करें, रात में हल्दी वाला गुनगुना दूध पीएं, जोर से खांसने से बचें और मुलेठी का सेवन करें, जो गले के लिए संजीवनी की तरह काम करती है। (With inputs from IANS)

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गले की सेहत के लिए अपनाएं आयुर्वेदिक आदतें और पाएं मधुर आवाज़।
Khushi Chittoria
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Khushi Chittoria joined Medical Dialogues in 2025 as a Media and Editorial Intern. She holds a degree in Bachelor of Arts in Journalism and Mass Communication from IP University and has completed certifications in content writing. She has a strong interest in anchoring, content writing, and editing. At Medical Dialogues, Khushi works in the editorial department, web stories and anchoring.