सदियों पुरानी जड़ी-बूटी, जो आज की सेहत के लिए है बेहद जरूरी

नई दिल्ली: आयुर्वेद और पारंपरिक चिकित्सा में सदियों से जड़ी-बूटियों का इस्तेमाल स्वास्थ्य को बनाए रखने और बीमारियों से बचाव के लिए किया जाता रहा है। ऐसे ही एक प्रभावशाली और लाभकारी औषधीय पौधे में से एक है गोटू कोला। यह छोटे आकार का हरा पौधा है, जिसकी गोल और चमकीली पत्तियां इसे आसानी से पहचानने योग्य बनाती हैं। इसे वैज्ञानिक भाषा में सेंटेला एशियाटिका कहा जाता है, जबकि भारत में इसे आमतौर पर मंडूकपर्णी के नाम से जाना जाता है।
गोटू कोला मुख्य रूप से दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों में पाया जाता है। इसके विशेष रूप से श्रीलंका में मौजूद प्रजातियों को वहां के लोग सब्जी, सलाद या जूस के रूप में अपने आहार में शामिल करते हैं। यह जमीन के पास उगने वाला पौधा है और स्वास्थ्य के लिए इसके कई लाभ बताए गए हैं। अमेरिका की नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन ने भी गोटू कोला की विशेषताओं और पोषक तत्वों पर जोर दिया है। उनके अनुसार इसमें ऐसे तत्व पाए जाते हैं, जो शरीर को फ्री रेडिकल्स से बचाने में मदद करते हैं और त्वचा को स्वस्थ बनाए रखते हैं। इसके अलावा, यह घाव भरने और शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में भी कारगर माना जाता है।
हालांकि, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ (NIH) के अनुसार गोटू कोला पर अब तक किए गए क्लिनिकल ट्रायल बहुत सीमित हैं। इसलिए इसके प्रभाव, लाभ और संभावित दुष्प्रभावों को पूरी तरह समझने के लिए और अधिक वैज्ञानिक शोध की आवश्यकता है।
आयुर्वेद के सुश्रुत संहिता में इसे विशेष औषधीय जड़ी-बूटी के रूप में शामिल किया गया है। इसे त्रिदोष संतुलित करने वाला और वात-पित्त शामक गुणों वाली जड़ी-बूटी माना जाता है। आयुर्वेद में इसका इस्तेमाल मस्तिष्क शक्ति बढ़ाने, त्वचा संबंधी घाव भरने और रोग प्रतिरोधक क्षमता को सुधारने के लिए किया जाता है।
गोटू कोला प्राकृतिक और बहुमुखी औषधीय पौधा है, जिसे संतुलित आहार में शामिल करने से पहले डॉक्टर या आयुर्वेद विशेषज्ञ की सलाह लेना आवश्यक है। सही तरीके से इसका उपयोग स्वास्थ्य के लिए वरदान साबित हो सकता है। यह पौधा प्रकृति का अनमोल तोहफा है, जो सही ज्ञान और मार्गदर्शन के साथ आधुनिक जीवनशैली में भी स्वास्थ्य लाभ प्रदान कर सकता है। (With inputs from IANS)


