जीवन के रहस्य सचमुच बेहद अद्भुत और रहस्यमय हैं। ऑक्सीजन हमारे वातावरण का एक महत्वपूर्ण तत्व है, जो जीवन के लिए बेहद जरूरी है। हाल ही में एक रिसर्च आधारित रिपोर्ट में दावा किया गया है कि कम ऑक्सीजन की स्थिति में भी नए जीवन से जुड़ा एक खास रहस्य छिपा हो सकता है।

दुनिया भर के वैज्ञानिक लंबे समय से यह जानने की कोशिश कर रहे हैं कि आखिर कुछ जीव—जैसे मेंढक या सलामेंडर—अपने कटे हुए अंगों को दोबारा कैसे उगा लेते हैं, जबकि इंसान ऐसा नहीं कर पाते। अब इस पहेली को सुलझाने की दिशा में एक अहम कदम उठाया गया है। प्रतिष्ठित जर्नल साइंस में प्रकाशित रिसर्च ने इस रहस्य पर नई रोशनी डाली है।

कैन एज्टेकिन के नेतृत्व में एक टीम ने पाया कि अंगों के दोबारा बनने में ऑक्सीजन की बहुत अहम भूमिका रहती है। मेंढक के टैडपोल और एम्ब्रियोनिक चूहों के कटे हुए अंगों की तुलना कर, शोधकर्ताओं ने पाया कि सेल्स जिस तरह से ऑक्सीजन को महसूस करती हैं, उससे यह तय होता है कि दोबारा बनना शुरू हो भी सकता है या नहीं।

इस अध्ययन के मुताबिक, अंगों के दोबारा उगने (रीजेनरेशन) की क्षमता का सीधा संबंध हमारे शरीर में मौजूद ऑक्सीजन के स्तर से है। सरल शब्दों में कहें तो—जहां ऑक्सीजन कम होती है, वहां शरीर में “नया अंग बनाने” की प्रक्रिया सक्रिय हो सकती है, जबकि ज्यादा ऑक्सीजन इस प्रक्रिया को रोक देती है।

वैज्ञानिकों ने अपने प्रयोगों में मेंढक के टैडपोल और चूहों के भ्रूण का उपयोग किया। टैडपोल ऐसे जीव हैं जो अपने अंगों को दोबारा विकसित करने में सक्षम होते हैं, जबकि चूहे और उसी तरह इंसान इस क्षमता से वंचित हैं। जब इन जीवों के टिशू (ऊतक) को अलग-अलग ऑक्सीजन स्तर पर रखा गया, तो चौंकाने वाले नतीजे सामने आए।

कम ऑक्सीजन वाले माहौल में कोशिकाएं तेजी से सक्रिय हो गईं और घाव भरने के साथ-साथ नए ऊतक बनाने लगीं। इस प्रक्रिया में एक खास प्रोटीन—एचआईएफ1ए—की महत्वपूर्ण भूमिका पाई गई। यह प्रोटीन कम ऑक्सीजन की स्थिति में “स्विच ऑन” होकर शरीर को मरम्मत से आगे बढ़ाकर रीजेनरेशन मोड में ले जाता है।

इसके विपरीत, जब ऑक्सीजन का स्तर ज्यादा था, तो कोशिकाएं जल्दी-जल्दी घाव को भरने के लिए “स्कार” यानी दाग बना देती हैं। यही कारण है कि इंसानों में कटे हुए अंगों की जगह सिर्फ निशान बन जाता है, नया अंग नहीं उगता।

इस शोध का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि यह संकेत देता है कि इंसानों के भीतर भी कहीं न कहीं रीजेनरेशन की क्षमता मौजूद हो सकती है, लेकिन हमारी जैविक प्रणाली उसे सक्रिय नहीं होने देती। यानी समस्या क्षमता की कमी नहीं, बल्कि उसे “चालू” करने के तरीके की है।

अगर भविष्य में वैज्ञानिक इस ऑक्सीजन-सेंसिंग सिस्टम को नियंत्रित करना सीख जाते हैं, तो चिकित विज्ञान में क्रांतिकारी बदलाव संभव हैं।

With Inputs From IANS

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जीवन के रहस्य बेहद अद्भुत हैं। एक नई रिसर्च में दावा किया गया है कि कम ऑक्सीजन में भी नए जीवन का रहस्य छिपा हो सकता है।
Kanchan Chaurasiya
Kanchan Chaurasiya

Kanchan Chaurasiya joined Medical Dialogues in 2025 as a Media and Marketing Coordinator. She holds a Bachelor's degree in Arts from Delhi University and has completed certifications in digital marketing. With a strong interest in health news, content creation, hospital updates, and emerging trends, Kanchan manages social media, news coverage, and public relations activities. She coordinates media outreach, creates press releases, promotes healthcare professionals and institutions, and supports health awareness campaigns to ensure accurate, engaging, and timely communication for the medical community and the public.