नई दिल्ली: मधुमालती, जिसे गुलाबी चार पंखुड़ियों और मनमोहक खुशबू के लिए जाना जाता है, केवल एक सजावटी पौधा नहीं है, बल्कि आयुर्वेद में इसके कई औषधीय गुण भी हैं। इस पौधे का उल्लेख प्राचीन चिकित्सा ग्रंथ सुश्रुत संहिता में भी मिलता है, जिसमें इसके विभिन्न स्वास्थ्य लाभों का विस्तार से वर्णन किया गया है। आयुर्वेद में इसे 'रंगून क्रीपर' के नाम से जाना जाता है, और इसकी देखभाल करना आसान होता है।

मधुमालती के फूल और पत्तों का उपयोग सदियों से कई बीमारियों के इलाज में किया जाता रहा है। यह सर्दी, खांसी, बुखार, जोड़ों के दर्द (गठिया) और त्वचा रोगों में लाभकारी माना जाता है। खासकर मधुमालती की छाल का काढ़ा किडनी में सूजन कम करने और किडनी की कार्यक्षमता को बेहतर बनाने में मदद करता है। चिकित्सक की सलाह से इसका नियमित सेवन शरीर के अंदरूनी अंगों की सूजन को घटाकर उन्हें सही तरीके से कार्य करने में सक्षम बनाता है।

महिलाओं के लिए भी मधुमालती बेहद फायदेमंद है। मासिक धर्म के दौरान दर्द और पेल्विक फ्लो से जुड़ी सूजन में इसके काढ़े का सेवन राहत दिलाता है। इसके अलावा यह हार्मोन संतुलन बनाने और मोटापा कम करने में भी सहायक माना जाता है। ताजे फूल महिलाओं में सफेद पानी की समस्या में लाभकारी हैं और कमर दर्द तथा हड्डियों से जुड़ी समस्याओं में राहत देते हैं।

त्वचा संबंधी रोगों, जैसे खुजली, मुहांसे और अन्य त्वचा संक्रमणों में मधुमालती की पत्तियों का लेप उपयोगी होता है। पुरानी खांसी, सर्दी और जुकाम जैसी समस्याओं में तुलसी के साथ मधुमालती की पत्तियों का काढ़ा बनाकर सेवन करना बेहद फायदेमंद है। स्वाद और पौष्टिकता बढ़ाने के लिए इसमें शहद मिलाना भी सुझावित है।

इस तरह मधुमालती न केवल अपने सुंदर रूप और खुशबू के कारण प्रिय है, बल्कि इसके औषधीय गुण इसे आयुर्वेद में एक महत्वपूर्ण पौधा बनाते हैं। इसे घर पर उगाना आसान है और नियमित उपयोग से शरीर और स्वास्थ्य को कई तरह के लाभ मिल सकते हैं।

कुल मिलाकर, मधुमालती आयुर्वेदिक दृष्टि से सर्दी-जुकाम, खांसी, जोड़ों के दर्द, मासिक धर्म के दर्द, किडनी की सूजन और त्वचा संबंधी परेशानियों में एक प्राकृतिक और प्रभावी उपाय साबित होता है। (With inputs from IANS)

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मधुमालती एक सुंदर पौधा है जो खांसी, सर्दी और मासिक धर्म के दर्द में आराम पहुँचाने में मदद करता है।
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