'जीरो-फैट' का कॉन्सेप्ट बिगाड़ सकता है सेहत, जानें कितनी जरूरी है शरीर के लिए वसा

नई दिल्ली: आज की तेज़-रफ्तार जीवनशैली में शारीरिक गतिविधियों में कमी आ गई है, लेकिन स्वास्थ्य को लेकर लोगों की जागरूकता के नाम पर ‘जीरो-फैट’ या ‘लो-फैट’ आहार का ट्रेंड तेजी से बढ़ रहा है। लोग वजन कम करने और अपने शरीर को ‘तेल-मुक्त’ रखने के लिए तेल और घी को अपनी डाइट से लगभग पूरी तरह हटा रहे हैं। बाजार में भी इस ट्रेंड के अनुरूप कई ‘लो-फैट’ और ‘जीरो-फैट’ उत्पाद उपलब्ध हैं, जिन्हें लोग नियमित रूप से अपना रहे हैं।
हालांकि, आयुर्वेद और पोषण विशेषज्ञों के अनुसार, यह सोच कि वसा हानिकारक है और इसे पूरी तरह हटाना चाहिए, गलत और स्वास्थ्य के लिए जोखिमपूर्ण हो सकती है। वसा सिर्फ ऊर्जा प्रदान करने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह कोशिकाओं के निर्माण, शरीर में हार्मोन संतुलन और कई जैविक प्रक्रियाओं के लिए भी आवश्यक है। इस संदर्भ में बात केवल ‘गुड फैट’ की हो रही है, जो स्वास्थ्य के लिए लाभकारी होती है।
गुड फैट के स्रोत हैं: देशी घी, कच्ची घानी के तेल जैसे सरसों, नारियल और तिल, अखरोट, बादाम, अलसी के बीज, एवोकाडो और जैतून का तेल। इसके विपरीत, समोसा, पिज्जा और प्रोसेस्ड फूड में मौजूद वसा का सेवन सीमित करना चाहिए।
वसा का सेवन आवश्यक इसलिए भी है क्योंकि कई महत्वपूर्ण विटामिन—A, D, E और K—वसा में घुलनशील होते हैं। अगर डाइट में वसा की कमी होगी, तो इन विटामिन का अवशोषण ठीक से नहीं हो पाएगा। गुड फैट मस्तिष्क में न्यूरॉन्स के बीच संदेशों के आदान-प्रदान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, और इसकी कमी मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकती है। अल्जाइमर, डिप्रेशन और स्मृति से संबंधित समस्याओं की संभावना बढ़ सकती है।
इसके अलावा, वसा शरीर के दो मुख्य हॉर्मोन—टेस्टोस्टेरोन और एस्ट्रोजन—के उत्पादन के लिए भी महत्वपूर्ण है। महिलाओं में यदि पर्याप्त गुड फैट नहीं लिया जाता, तो मासिक धर्म और प्रजनन स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। इस प्रकार, ‘जीरो-फैट’ ट्रेंड को अंधाधुंध अपनाने के बजाय संतुलित मात्रा में स्वस्थ वसा का सेवन करना अत्यंत आवश्यक है। गुड फैट न केवल शरीर को ऊर्जा देता है, बल्कि हड्डियों, मस्तिष्क, हार्मोन और समग्र स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी है। (With inputs from IANS)


