नई दिल्ली: आयुर्वेद में यह माना जाता है कि हर व्यक्ति जन्म के समय एक विशिष्ट शारीरिक और मानसिक संरचना के साथ पैदा होता है, जिसे उसकी ‘प्रकृति’ या ‘प्रकृति प्रकार’ कहा जाता है। यह प्रकृति मुख्य रूप से तीन दोषों—वात, पित्त और कफ—के संतुलन या असंतुलन से बनती है। इन दोषों का प्रभाव केवल शारीरिक स्वास्थ्य पर ही नहीं, बल्कि मानसिक स्थिति, सोचने और व्यवहार करने की प्रवृत्ति, ऊर्जा स्तर और बीमारियों की संवेदनशीलता पर भी पड़ता है।

आयुर्वेद के अनुसार किसी व्यक्ति की प्रकृति केवल माता-पिता के जीन से नहीं बनती, बल्कि गर्भावस्था के दौरान मां की खानपान की आदतें, जीवनशैली और आसपास का वातावरण भी इसमें अहम भूमिका निभाते हैं। यही कारण है कि एक ही परिवार में जन्मे भाई-बहनों की प्रकृति अलग-अलग हो सकती है।

आयुर्वेद में सात प्रमुख प्रकृति प्रकारों का वर्णन किया गया है—वातज, पित्तज, कफज, वात-पित्त, पित्त-कफ, वात-कफ और त्रिदोषज। इनमें से कुछ व्यक्तियों में एक दोष प्रमुख रूप से दिखाई देता है, जबकि कुछ में दो या तीन दोषों का मिश्रण पाया जाता है।

वात प्रकृति वाले लोग आम तौर पर दुबले-पतले, सक्रिय और त्वरित कार्य करने वाले होते हैं। उनकी त्वचा रूखी रहती है, वे जल्दी सीखते हैं, लेकिन कई बार चीजें जल्दी भूल भी जाते हैं। पित्त प्रकृति के लोग तेज स्वभाव, गर्म शरीर और अधिक भूख-प्यास के साथ जन्म लेते हैं। उनमें नेतृत्व की क्षमता अक्सर ज्यादा होती है, लेकिन गुस्सा जल्दी आ सकता है। कफ प्रकृति वाले लोग मजबूत, शांत और धैर्यवान होते हैं। उनकी त्वचा मुलायम होती है और वे स्थिर और धीरे-धीरे काम करते हैं।

प्रकृति का ज्ञान केवल स्वभाव को समझने के लिए ही नहीं, बल्कि स्वास्थ्य बनाए रखने के लिए भी महत्वपूर्ण है। आयुर्वेद के अनुसार, हर प्रकृति के व्यक्तियों में कुछ विशेष बीमारियों की संभावना अधिक होती है। उदाहरण के लिए, वात प्रकृति वालों में जोड़ों का दर्द और ऑस्टियोआर्थराइटिस अधिक देखा जाता है। पित्त प्रकृति के लोग एसिडिटी, त्वचा रोग और रक्त से जुड़ी समस्याओं के प्रति संवेदनशील हो सकते हैं। कफ प्रकृति वाले व्यक्तियों में मोटापा और श्वसन संबंधी बीमारियों का खतरा अधिक रहता है।

इसलिए आयुर्वेद में यह सुझाया गया है कि व्यक्ति अपनी प्रकृति को समझकर उसी के अनुसार खान-पान, दिनचर्या और आदतें अपनाए। ऐसा करने से न केवल बीमारियों से बचा जा सकता है, बल्कि संतुलित और स्वस्थ जीवन भी जीया जा सकता है। (With inputs from IANS)

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आयुर्वेद के अनुसार हर व्यक्ति की शारीरिक और मानसिक विशेषताएँ उसकी प्राकृतिक ‘प्रकृति’ यानी वाता, पित्त और कफ से निर्धारित होती हैं।
Khushi Chittoria
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Khushi Chittoria joined Medical Dialogues in 2025 as a Media and Editorial Intern. She holds a degree in Bachelor of Arts in Journalism and Mass Communication from IP University and has completed certifications in content writing. She has a strong interest in anchoring, content writing, and editing. At Medical Dialogues, Khushi works in the editorial department, web stories and anchoring.