भारतीय वैज्ञानिकों ने बनाया एंटीबॉडी डिस्कवरी प्लेटफॉर्म, कैंसर और संक्रामक रोगों से लड़ाई में करेगा मदद

रुड़की: भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) रुड़की के वैज्ञानिकों ने एक अत्याधुनिक नेक्स्ट-जेनरेशन एंटीबॉडी डिस्कवरी प्लेटफॉर्म विकसित किया है, जिसे चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह प्लेटफॉर्म बीमारियों की पहचान और इलाज के तरीकों में व्यापक बदलाव ला सकता है।
इसकी मदद से संक्रामक रोगों, कैंसर, ऑटोइम्यून विकारों और उभरते हुए नए पैथोजेन्स के लिए अत्यधिक स्थिर और मजबूत बंधन वाली एंटीबॉडीज की तेज़ी से पहचान संभव हो सकेगी।
यह पहल आत्मनिर्भर भारत के विजन की दिशा में एक अहम कदम है, जिसका उद्देश्य देश में ही उन्नत और भरोसेमंद डायग्नोस्टिक तथा थैरेप्यूटिक टूल्स का विकास करना है। इस शोध के तहत वैज्ञानिकों ने एक अत्यंत बड़ी और उच्च विविधता वाली सिंगल-डोमेन एंटीबॉडी, जिसे नैनोबॉडी भी कहा जाता है, की लाइब्रेरी तैयार की है।
ये नैनोबॉडी आकार में छोटी होने के बावजूद अत्यधिक स्थिर होती हैं और अपने लक्ष्य से मजबूती से जुड़ने की क्षमता रखती हैं, जिससे वे रोग की पहचान और उपचार दोनों में अधिक सटीक और प्रभावी साबित हो सकती हैं।
इस प्लेटफॉर्म की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह एंटीबॉडी खोज की प्रक्रिया में लगने वाले समय को काफी हद तक कम कर देता है। इससे स्वास्थ्य सेवाओं में त्वरित प्रतिक्रिया संभव होगी, जो विशेष रूप से महामारी या आपातकालीन स्थितियों में बेहद महत्वपूर्ण साबित हो सकती है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इस तरह की तकनीक भविष्य में तेजी से फैलने वाली बीमारियों से निपटने में निर्णायक भूमिका निभा सकती है।
आईआईटी रुड़की के बायोसाइंसेज और बायोइंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर राजेश कुमार ने कहा कि भारत में एक यूनिवर्सल और हाई-डाइवर्सिटी एंटीबॉडी डिस्कवरी सिस्टम विकसित करके देश की रोगों से लड़ने की क्षमता को मजबूत किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि इसका उद्देश्य उन लोगों तक किफायती और प्रभावी जांच व उपचार पहुंचाना है, जिन्हें इसकी सबसे अधिक जरूरत है।
यह शोध आत्मनिर्भर भारत और मेक इन इंडिया की सोच को आगे बढ़ाता है, खासकर उन कम और मध्यम आय वाले देशों के लिए जहां समय पर और सस्ती स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच आज भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। यह पहल स्वदेशी अनुसंधान क्षमताओं को सशक्त करने, बौद्धिक संपदा के निर्माण और आयातित बायोलॉजिक्स पर निर्भरता को कम करने में भी सहायक होगी।
साथ ही, यह ट्रांसलेशनल रिसर्च को बढ़ावा देती है, जिससे प्रयोगशाला में हुई वैज्ञानिक खोजों को सीधे मरीजों के इलाज में लागू किया जा सकेगा।
आईआईटी रुड़की के निदेशक प्रोफेसर के. के. पंत ने कहा कि यह विकास इस बात का उदाहरण है कि कैसे मूलभूत शोध, ट्रांसलेशनल सोच और उद्योग के सहयोग से समाज की जटिल स्वास्थ्य चुनौतियों का समाधान निकाला जा सकता है। संस्थान ने बताया कि इस दिशा में आगे बढ़ते हुए आईआईटी रुड़की ने आईएमजेनएक्स इंडिया के साथ एक समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए हैं।
इस सहयोग के तहत संयुक्त शोध, उन्नत बायोलॉजिक्स का सह-विकास और एंटीबॉडी इंजीनियरिंग, डायग्नोस्टिक्स, चिकित्सा विज्ञान तथा बायोप्रोसेस डेवलपमेंट जैसे क्षेत्रों में क्षमता निर्माण को बढ़ावा दिया जाएगा। (With inputs from IANS)


