मोबाइल स्क्रीन से थक रहा बच्चों का दिमाग, बच्चों के लिए नई मानसिक स्वास्थ्य चुनौती

आज के आधुनिक भारत में स्मार्टफोन और टैबलेट बच्चों के लिए 'डिफ़ॉल्ट बेबीसिटर' बन गए हैं.लेकिन मनोवैज्ञानिकों की चेतावनी है कि स्क्रीन का ज्यादा इस्तेमाल बच्चों के सोने के तरीके, एकाग्रता और भावनाओं को बदल रहा है,जो बिल्कुल किसी नशे (Addiction) की तरह है.
क्या आपका बच्चा 'डिजिटल नशे' की गिरफ्त में है?
अक्सर माता-पिता इसे बच्चे की जिद या अनुशासनहीनता समझते हैं, लेकिन क्लिनिकल स्तर पर यह कुछ और ही है. जब बच्चा स्क्रीन के बिना चिड़चिड़ा होने लगे, पढ़ाई या खेल से दूरी बना ले और भूख-प्यास भूलकर बस फोन में खोया रहे, तो यह "प्रॉब्लेमैटिक स्क्रीन यूज" का संकेत है.
दिमाग पर स्क्रीन का असर: विज्ञान क्या कहता है?
बच्चे चाहकर भी फोन क्यों नहीं छोड़ पाते? इसके पीछे गहरा दिमागी विज्ञान है. टाइम्स ऑफ इंडिया को दिए एक इंटरव्यू में Dr. Agarwal's Eye Hospital के dr arnav singh saroya ने बताया कि कैसे बच्चे फोन को लेकर एडिक्ट हो रहे हैं. कब बच्चों को मोबाइल देना चाहिए, कब नहीं और कैसे मोबाइल बच्चों के दिमाग पर प्रेशर डाल रहा है.
डोपामाइन और रिवॉर्ड-सोशल मीडिया और गेम्स 'इंटरमिटेंट रीइन्फोर्समेंट' पर काम करते हैं. हर नया वीडियो या गेम लेवल दिमाग में 'डोपामाइन' रिलीज करता है, जिससे और अधिक देखने की लालसा पैदा होती है.
अधूरा दिमागी विकास- बच्चों में कंट्रोल रखने वाला हिस्सा (प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स) 25 साल की उम्र तक विकसित होता है, जबकि आनंद महसूस करने वाला हिस्सा जल्दी सक्रिय हो जाता है. इसलिए बच्चे अपनी इच्छाओं पर काबू नहीं पा पाते.
एकाग्रता में कमी-तेजी से बदलते वीडियो बच्चों के दिमाग को लगातार उत्तेजना (Stimulation) का आदी बना देते हैं. इसके बाद उन्हें किताबें पढ़ना या क्लास में सुनना बहुत उबाऊ लगने लगता है.
नींद में खलल-स्क्रीन से निकलने वाली नीली रोशनी 'मेलाटोनिन' (नींद का हार्मोन) को रोक देती है, जिससे बच्चों की नींद की गुणवत्ता खराब हो जाती है और वे दिनभर चिड़चिड़े रहते हैं.
स्क्रीन टाइम के लिए विशेषज्ञों की गाइडलाइन (IAP & WHO)
- भारतीय बाल रोग अकादमी (IAP) ने उम्र के अनुसार साफ नियम दिए हैं.
- 2 वर्ष से कम- कोई स्क्रीन नहीं (जीरो स्क्रीन टाइम).
- 2 से 5 साल-अधिकतम 1 घंटा (अभिभावकों की देखरेख में).
- 5 साल से ज्यादा-2 घंटे से कम.
खतरे के संकेत (Red Flags)
- स्क्रीन छीनने पर अत्यधिक गुस्सा या हिंसक होना.
- नींद, खेल और पढ़ाई की अनदेखी करना.
- फोन के इस्तेमाल करने को लेकर झूठ बोलना या छिपकर देखना.
- आंखों में तनाव, सिरदर्द या दिन में सुस्ती महसूस करना.
पैरेंट्स को क्या करना चाहिए
केवल डांटने या फोन छीनने से समस्या हल नहीं होगी. माहौल बदलें, नियम नहीं-घर के चार्जर बेडरूम से बाहर रखें. खाना खाते समय फोन का उपयोग पूरी तरह वर्जित (No Screen Zone) करें. नींद को प्राथमिकता दें-सोने से कम से कम 60 मिनट पहले सभी गैजेट्स बंद कर दें. स्क्रीन-फ्री बेडरूम सबसे अच्छा समाधान है. अगर आप फोन छीन रहे हैं, तो बच्चे को कुछ और दें—जैसे स्पोर्ट्स, संगीत, पेंटिंग या साथ में कोई बोर्ड गेम खेलें. अगर माता-पिता खुद हर समय फोन पर रहेंगे, तो बच्चा भी वही सीखेगा. 'डिजिटल डिटॉक्स' में पूरे परिवार को शामिल करें. कई बार बच्चे तनाव, अकेलेपन या स्कूल में किसी परेशानी के कारण स्क्रीन का सहारा लेते हैं. उनकी बात सुनें और उनसे जुड़ाव महसूस कराएं.


