मुंबई में बढ़ा फेफड़ों के कैंसर का खतरा, अब केवल धूम्रपान ही नहीं, प्रदूषण भी है बड़ी वजह

विश्व कैंसर दिवस के अवसर पर जारी टाटा मेमोरियल सेंटर (TMC) की एक नई रिपोर्ट ने चिंता बढ़ा दी है. रिपोर्ट के अनुसार, मुंबई में फेफड़ों के कैंसर का स्वरूप बदल रहा है. अब यह बीमारी केवल धूम्रपान करने वालों तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि उन लोगों को भी अपनी चपेट में ले रही है जिन्होंने कभी सिगरेट या बीड़ी को हाथ तक नहीं लगाया.
नॉन-स्मोकर्स में 'एडिनोकार्सिनोमा' का बढ़ता प्रसार
टाटा मेमोरियल सेंटर की रिपोर्ट "कैंसर इंसिडेंस इन इंडिया"के मुताबिक, मुंबई में एडिनोकार्सिनोमा (Adenocarcinoma)अब फेफड़ों के कैंसर का सबसे प्रमुख प्रकार बन गया है.यह फेफड़ों के कैंसर का वह प्रकार है जो अक्सर गैर-धूम्रपान करने वालों, विशेषकर महिलाओं को प्रभावित करता है. आंकड़ों के अनुसार, मुंबई में फेफड़ों के कैंसर के कुल मामलों में 56 प्रतिशत हिस्सा एडिनोकार्सिनोमा का है.इसके विपरीत, स्क्वैमस सेल कार्सिनोमा (जो मुख्य रूप से धूम्रपान से जुड़ा है) केवल 28 प्रतिशत मामलों में देखा गया है.
क्या हैं इसके मुख्य कारण?
टाटा मेमोरियल सेंटर के प्रोफेसर डॉ. अतुल बुदुक के अनुसार, मुंबई में कैंसर के बढ़ते मामलों के पीछे केवल तंबाकू ही नहीं, बल्कि ये पर्यावरणीय कारक भी जिम्मेदार हैं.
- वायु प्रदूषण-शहरी हवा में मौजूद जहरीले कण.
- बायोमास ईंधन-खाना पकाने के लिए इस्तेमाल होने वाला जलाऊ कोयला या लकड़ी.
- व्यावसायिक खतरे-कारखानों या निर्माण स्थलों पर रसायनों और धूल के संपर्क में आना.
- जेनेटिक कारक-आनुवंशिक संरचना जो फेफड़ों को संवेदनशील बनाती है.
भारत बनाम पश्चिमी देश, गंभीर स्थिति
द लैंसेट (The Lancet) में प्रकाशित एक समीक्षा के अनुसार, भारत में फेफड़ों के कैंसर के मरीज पश्चिमी देशों की तुलना में लगभग 10 साल पहले (औसतन 54 से 70 वर्ष की आयु में) बीमार पड़ रहे हैं.
- भारत में लगभग 40 से 50 प्रतिशत मरीज ऐसे हैं जिन्होंने कभी धूम्रपान नहीं किया.
- दक्षिण एशियाई महिलाओं में यह आंकड़ा 83 प्रतिशत तक पहुंच जाता है.
- जीवित रहने की दर (Survival Rate) के मामले में भी भारत (3.7%) अमेरिका (21.2%) और जापान (32.9%) से काफी पीछे है.
टीबी (TB) और कैंसर का भ्रम
मुंबई में एक बड़ी चुनौती यह है कि फेफड़ों के कैंसर के लक्षणों को अक्सर तपेदिक (Tuberculosis) समझ लिया जाता है. शोध के अनुसार, लगभग 29 प्रतिशत कैंसर मरीजों का शुरुआती इलाज टीबी मानकर किया गया, जिससे उनके वास्तविक उपचार में देरी हुई.
एक्सपर्ट क्या सलाह देते हैं
डॉ. बुदुक ने चेतावनी दी है कि 2025 तक मुंबई में कैंसर के मामलों में भारी उछाल आ सकता है. इससे लड़ने के लिए विशेषज्ञों ने कई सुझाव दिए हैं.आणविक परीक्षण (Molecular Testing) का विस्तार,तंबाकू नियंत्रण के सख्त नियम. टीबी और कैंसर की जांच के लिए एकीकृत स्क्रीनिंग प्रोग्राम.वायु गुणवत्ता में सुधार के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति.


