नई दिल्ली: हर साल 2 अप्रैल को विश्व ऑटिज़्म जागरूकता दिवस मनाया जाता है। यह दिन केवल एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं है, बल्कि यह हमें याद दिलाता है कि हमारे समाज में ऐसे लोग भी हैं जो दुनिया को अलग नजरिए से देखते और समझते हैं।

उन्हें सहानुभूति से अधिक, समझ, स्वीकार्यता और सम्मान की आवश्यकता है।ऑटिज्म, जिसे ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (एएसडी) भी कहा जाता है, कोई बीमारी नहीं है जिसे ठीक किया जाए। यह दिमाग के काम करने का एक अलग तरीका है। ऑटिज्म से जुड़े लोग दुनिया को, लोगों को और चीजों को अलग नजरिए से महसूस करते हैं।

अक्सर देखा जाता है कि समाज में ऑटिज्म को लेकर कई गलतफहमियां हैं। लोग इसे कमजोरी या कमी समझ लेते हैं, जबकि सच यह है कि यह एक तरह की न्यूरोडायवर्सिटी है। जैसे हर इंसान का स्वभाव अलग होता है, वैसे ही ऑटिज्म वाले लोगों का सोचने और समझने का तरीका भी अलग होता है।

ऑटिज्म के कुछ सामान्य संकेत बचपन में ही दिखने लगते हैं। जैसे बच्चे का आंखों में कम देखना, बोलने में देरी होना, बार-बार एक ही हरकत करना या दिनचर्या में थोड़ा बदलाव होने पर परेशान हो जाना। कुछ बच्चों को तेज आवाज, रोशनी या कुछ खास चीजों से ज्यादा परेशानी भी हो सकती है। लेकिन हर ऑटिज्म से प्रभावित व्यक्ति अलग होता है। किसी में लक्षण ज्यादा होते हैं, तो किसी में कम।

समाज में फैली गलतफहमियों को दूर करने के लिए सबसे जरूरी है जागरूकता। जब तक हमें सही जानकारी नहीं होगी, हम सही व्यवहार भी नहीं कर पाएंगे। हमें यह समझना होगा कि ऑटिज्म कोई गलत चीज नहीं है, बल्कि एक अलग तरह की क्षमता है।

दूसरी चीज है स्वीकार्यता। हमें ऑटिज्म वाले लोगों को बदलने की कोशिश करने के बजाय उन्हें वैसे ही स्वीकार करना चाहिए जैसे वे हैं। अगर कोई बच्चा थोड़ा अलग व्यवहार करता है, तो उसे जज करने के बजाय समझने की कोशिश करनी चाहिए।

तीसरी और सबसे अहम चीज है सम्मान। हर इंसान की तरह ऑटिज्म से जुड़े लोगों को भी बराबरी का हक है, चाहे वो स्कूल हो, नौकरी हो या समाज। उन्हें भी अपने सपनों को पूरा करने का पूरा अधिकार है। आज के समय में कई संगठन और स्कूल इस दिशा में काम कर रहे हैं। अब पहले की तुलना में लोग ज्यादा जागरूक हो रहे हैं।

ऑटिज्म से जुड़े बच्चों के लिए स्पेशल एजुकेशन और थेरेपी जैसी सुविधाएं भी बढ़ रही हैं। अगर ऑटिज्म के लक्षण जल्दी पहचान लिए जाएं, तो सही थेरेपी और सपोर्ट से बच्चों की जिंदगी में बड़ा बदलाव लाया जा सकता है। स्पीच थेरेपी, ऑक्यूपेशनल थेरेपी और बिहेवियरल थेरेपी जैसे तरीके काफी मददगार साबित होते हैं। (With inputs from IANS)

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Topic:

विश्व ऑटिज़्म जागरूकता दिवस 2026 का उद्देश्य समाज में ऑटिज़्म के प्रति समझ, सम्मान और स्वीकार्यता बढ़ाना है।
Kanchan Chaurasiya
Kanchan Chaurasiya

Kanchan Chaurasiya joined Medical Dialogues in 2025 as a Media and Marketing Coordinator. She holds a Bachelor's degree in Arts from Delhi University and has completed certifications in digital marketing. With a strong interest in health news, content creation, hospital updates, and emerging trends, Kanchan manages social media, news coverage, and public relations activities. She coordinates media outreach, creates press releases, promotes healthcare professionals and institutions, and supports health awareness campaigns to ensure accurate, engaging, and timely communication for the medical community and the public.