टीबी के इलाज में उम्मीद की किरण: नई वैक्सीन और दवाओं पर बड़े ट्रायल शुरू

टीबी (ट्यूबरकुलोसिस) के इलाज और रोकथाम में अब नई उम्मीद दिखाई दे रही है। कई सालों की धीमी प्रगति के बाद अब नई वैक्सीन और दवाएं आखिरी चरण (Phase III) के ट्रायल में पहुंच चुकी हैं। आज भी दुनिया में BCG ही एकमात्र टीबी वैक्सीन है, जो ज्यादातर छोटे बच्चों को ही सुरक्षा देती है। बड़ों के लिए अभी तक कोई असरदार वैक्सीन उपलब्ध नहीं है, जबकि ज्यादातर केस वयस्कों में ही होते हैं।
Clinical Trials Arena में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, टीबी का इलाज अभी भी लंबा और मुश्किल है। सामान्य इलाज करीब 6 महीने चलता है, जबकि MDR-TB (दवा-प्रतिरोधी टीबी) में इससे भी ज्यादा समय लग सकता है। इससे मरीजों को दवाओं के साइड इफेक्ट और इलाज बीच में छोड़ने की समस्या होती है।
WHO के मुताबिक टीबी अभी भी दुनिया की बड़ी स्वास्थ्य समस्याओं में से एक है। GlobalData के अनुसार, 2024 में करीब 40 लाख केस थे, जो 2033 तक बढ़कर 45 लाख हो सकते हैं।
इस बीच M72/AS01E नाम की एक नई वैक्सीन काफी उम्मीद जगा रही है। यह वैक्सीन शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत बनाकर टीबी के बैक्टीरिया से लड़ने में मदद करती है। पहले के ट्रायल में इसने वयस्कों में टीबी के मामलों को लगभग 50% तक कम किया था, जो एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है। अभी इसका Phase III ट्रायल कई देशों में चल रहा है, जिसमें हजारों लोगों को शामिल किया गया है। अगर यह सफल रहती है, तो यह बड़ों के लिए पहली प्रभावी टीबी वैक्सीन बन सकती है और दुनिया भर में टीबी की रोकथाम का तरीका बदल सकती है।
इलाज के क्षेत्र में भी नए विकल्प सामने आ रहे हैं। चीन में sudapyridine नाम की दवा का ट्रायल चल रहा है, जिसे मौजूदा दवा bedaquiline का बेहतर और सुरक्षित विकल्प माना जा रहा है। शुरुआती जानकारी के अनुसार, यह दवा उतनी ही असरदार हो सकती है, लेकिन इसके साइड इफेक्ट कम हो सकते हैं। अगर ऐसा होता है, तो मरीजों के लिए इलाज ज्यादा सुरक्षित और आसान बन सकता है, खासकर उन लोगों के लिए जो लंबे समय तक दवाइयों के दुष्प्रभाव झेलते हैं।
वहीं quabodepistat नाम की एक और नई दवा पर भी काम चल रहा है, जिसका मकसद इलाज की अवधि को कम करना है। अभी MDR-TB का इलाज आमतौर पर 6 महीने या उससे ज्यादा चलता है, लेकिन इस नई दवा के साथ इसे 4 महीने तक लाने की कोशिश की जा रही है। शुरुआती ट्रायल में इसके अच्छे नतीजे सामने आए हैं, जहां कम समय में भी इलाज उतना ही असरदार दिखा। अगर यह आगे भी सफल रहता है, तो मरीजों के लिए इलाज पूरा करना आसान होगा और बीच में दवा छोड़ने की समस्या भी कम हो सकती है।
इसके अलावा, वैज्ञानिक सिर्फ नई दवाएं ही नहीं बना रहे, बल्कि पुराने इलाज को भी बेहतर बनाने पर काम कर रहे हैं। कई बड़े ट्रायल्स में अलग-अलग दवाओं के कॉम्बिनेशन को टेस्ट किया जा रहा है, ताकि सबसे सुरक्षित और असरदार इलाज तैयार किया जा सके। इसका उद्देश्य यह है कि मरीज को कम साइड इफेक्ट हों, इलाज जल्दी पूरा हो और बीमारी दोबारा न लौटे। कुल मिलाकर, ये सभी प्रयास टीबी के इलाज को पहले से कहीं ज्यादा आसान और मरीज के अनुकूल बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम हैं।


