माघ माह में बढ़ जाता है तिल का महत्व, यहां समझें धर्म और आयुर्वेद का गणित

नई दिल्ली: माघ मास को वर्ष का सबसे ठंडा समय माना जाता है, जिसके चलते शीत से जुड़ी बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाता है। ऐसे में गर्म तासीर वाले तिल का महत्व धर्म और आयुर्वेद—दोनों में विशेष रूप से बढ़ जाता है। मकर संक्रांति, तिल द्वादशी, गणेश चतुर्थी जैसे पर्वों पर तिल से स्नान, दान, पूजा और भोजन करना अत्यंत पुण्यकारी बताया गया है।
माघ माह की ठंड में वात दोष प्रबल हो जाता है, जिससे शरीर में रूखापन, जोड़ों में दर्द और थकान महसूस होती है। तिल की उष्ण प्रकृति और स्निग्ध गुण वात को शांत कर इन समस्याओं से राहत देते हैं। धर्मग्रंथों में इस महीने तिल का दान, तिल मिश्रित जल से स्नान और तिल-गुड़ के लड्डू का सेवन विशेष फलदायी माना गया है। गणेश चतुर्थी पर भगवान गणेश को तिल के लड्डू अर्पित करने की परंपरा है, जबकि संक्रांति और षटतिला एकादशी पर तिल के छह प्रकार से उपयोग का विधान बताया गया है।
शास्त्रों में तिल के छह प्रमुख उपयोग बताए गए हैं—तिल मिले जल से स्नान करना, शरीर पर तिल का लेप लगाना, हवन में तिल की आहुति देना, ब्राह्मणों या जरूरतमंदों को तिल का दान करना, व्रत के दौरान तिल से बने खाद्य पदार्थों का सेवन करना और तिल मिश्रित जल पीना या पितरों का तर्पण करना। इन सभी कर्मों से व्यक्ति को शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होते हैं।
धार्मिक मान्यता है कि जो लोग नदी में स्नान नहीं कर पाते, वे यदि घर पर तिल मिलाकर स्नान करें तो भी संक्रांति का पूर्ण पुण्य प्राप्त होता है। आयुर्वेद में तिल को ‘सर्वदोषहर’ कहा गया है, क्योंकि यह शरीर को पोषण देने के साथ रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी मजबूत करता है। माघ मास में तिल का सेवन न केवल धार्मिक दृष्टि से फलदायी है, बल्कि स्वास्थ्य के लिए भी अत्यंत लाभकारी माना जाता है।
आयुर्वेदाचार्यों के अनुसार तिल की तासीर गर्म होती है, जो शरीर में ऊष्मा बढ़ाकर सर्दी-खांसी, जोड़ों के दर्द और ठंड से होने वाली कमजोरी से बचाव करती है। यह वात और कफ दोष को संतुलित करता है, हालांकि पित्त को थोड़ा बढ़ा सकता है, इसलिए गर्मियों में इसका सीमित सेवन उचित रहता है। तिल स्वभाव से भारी, तैलीय और पौष्टिक होता है, जो शरीर के ऊतकों को नमी देकर मजबूती प्रदान करता है।
पोषक तत्वों से भरपूर तिल में कैल्शियम, आयरन, विटामिन ई और एंटीऑक्सीडेंट्स प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। नियमित रूप से तिल का सेवन या तिल के तेल से मालिश करने से हड्डियां मजबूत होती हैं, दांत स्वस्थ रहते हैं और बालों का झड़ना कम होता है। यह पाचन तंत्र को बेहतर बनाता है, कब्ज से राहत देता है और गैस व एसिडिटी की समस्या को कम करता है। तिल का तेल त्वचा को कोमल बनाता है, घाव भरने में सहायक होता है और एंटी-एजिंग गुणों के कारण त्वचा को युवा बनाए रखने में मदद करता है। (With inputs from IANS)


