फूड एलर्जी और जेनेटिक्स: वैज्ञानिकों ने खोजा क्यों खान-पान की एलर्जी खानदान दर खानदान चलती है?

अक्सर देखा जाता है कि अगर माता-पिता को किसी खास खाने से एलर्जी है, तो बच्चों में भी इसके लक्षण मिलते हैं. लेकिन अब तक इसके पीछे के आनुवंशिक (Genetic) कारण स्पष्ट नहीं थे.यूटी साउथवेस्टर्न मेडिकल सेंटर (UT Southwestern Medical Center) के रिसर्चर ने पहली बार एक गहन जेनेटिक अध्ययन के जरिए इस रहस्य से पर्दा उठाया है. 'द जर्नल ऑफ एलर्जी एंड क्लिनिकल इम्यूनोलॉजी' में प्रकाशित यह शोध बताता है कि 10 में से लगभग 4 लोग, जिन्हें एक से अधिक खाद्य पदार्थों से एलर्जी है, उनमें स्पष्ट आनुवंशिक कारण मौजूद होते हैं.
क्यों होती है बार-बार फूड एलर्जी?
यह अध्ययन उन मरीजों पर केंद्रित था जिन्हें दो या दो से अधिक खाद्य पदार्थों (जैसे मूंगफली, दूध, अंडा आदि) से एलर्जी थी. रिसर्चर ने पाया कि इनमें से 40% लोगों में 'लॉस-ऑफ-फंक्शन' (Loss-of-function) नामक दुर्लभ म्यूटेशन था, जो एलर्जी के जोखिम को बढ़ा देता है.
इस स्टडी की प्रमुख खोजें
अधिकांश म्यूटेशन 'FLG' जीन में पाए गए. यह जीन त्वचा की सुरक्षात्मक परत (Skin Barrier) बनाने में मदद करता है. जब यह परत कमजोर होती है, तो एलर्जी पैदा करने वाले तत्व आसानी से शरीर में प्रवेश कर जाते हैं और इम्यून सिस्टम को उत्तेजित कर देते हैं.
नई 'Whole Exome Sequencing' तकनीक ने पारंपरिक तरीकों के मुकाबले 58% अधिक म्यूटेशन की पहचान की. यह तकनीक उन लोगों के लिए विशेष रूप से मददगार साबित हुई जो यूरोपीय मूल के नहीं हैं.
शोध में ऐसे जीन म्यूटेशन भी मिले जो वायरस की पहचान करने वाले इम्यून रिस्पॉन्स से जुड़े हैं. यह इस थ्योरी को बल देता है कि बचपन में संक्रमणों के संपर्क में आने और फूड एलर्जी के बीच गहरा संबंध है.
फूड एलर्जी की गंभीर स्थिति
अमेरिका में लगभग 3.3 करोड़ लोग फूड एलर्जी से प्रभावित हैं, जिसके कारण हर साल लाखों लोग इमरजेंसी रूम पहुंचते हैं. भारत में भी बदलती जीवनशैली के कारण बच्चों में फूड एलर्जी के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं. फिलहाल में इसके उपचार के विकल्प बहुत सीमित हैं, लेकिन यह शोध 'प्रिसिजन मेडिसिन' (सटीक उपचार) की राह खोलता है.
व्यक्तिगत उपचार (Individualized Care)
मुख्य शोधकर्ता डॉ. जेफरी ए. सोरेल के अनुसार, "एडवांस्ड डीएनए टेस्टिंग से हम न केवल एलर्जी के कारण को समझ सकते हैं, बल्कि भविष्य में हर मरीज की जैविक संरचना (Biology) के आधार पर व्यक्तिगत इलाज भी कर सकेंगे." यूटी साउथवेस्टर्न की टीम अब 2025 में शुरू हुए SPARC प्रोग्राम के जरिए इस शोध को और विस्तार देने की योजना बना रही है, ताकि यह समझा जा सके कि विशिष्ट जेनेटिक वेरिएंट्स इलाज के प्रति कैसे प्रतिक्रिया देते हैं.


