लेटते ही पैरों में झनझनाहट? हो सकता है रेस्टलेस लेग्स सिंड्रोम

नई दिल्ली: रात का समय सामान्यत: शरीर और दिमाग के आराम का होता है, लेकिन कुछ लोगों के लिए यही समय बेचैनी और असहजता लेकर आता है। ऐसे लोग जैसे ही बिस्तर पर लेटते हैं, उन्हें पैरों में झनझनाहट, हल्की जलन, खिंचाव या दर्द जैसी परेशानियां महसूस होने लगती हैं।
अक्सर पैरों को हिलाने या चलने से थोड़ी राहत मिलती है, लेकिन जैसे ही व्यक्ति फिर से स्थिर होता है, परेशानी दोबारा शुरू हो जाती है। कई लोग इसे सामान्य थकान या दिनभर की मेहनत का असर समझकर अनदेखा कर देते हैं, लेकिन वास्तव में यह समस्या रेस्टलेस लेग्स सिंड्रोम (RLS) हो सकती है।
विज्ञान के अनुसार, रेस्टलेस लेग्स सिंड्रोम का मुख्य संबंध मस्तिष्क और नसों से है। हमारे मस्तिष्क में डोपामिन नामक रसायन मांसपेशियों की गतिविधियों को नियंत्रित करता है। जब डोपामिन का संतुलन बिगड़ता है, तो पैरों की अनियमित हरकतों और बार-बार हिलाने की इच्छा पैदा होती है।
कुछ विशेषज्ञ इसे पार्किंसंस रोग से जोड़कर भी देखते हैं, क्योंकि इस बीमारी में भी डोपामिन की कमी पाई जाती है। हालांकि, रेस्टलेस लेग्स सिंड्रोम और पार्किंसंस रोग अलग-अलग स्थितियां हैं, लेकिन दोनों में रासायनिक असंतुलन का महत्वपूर्ण योगदान होता है।
इसके अलावा, आयरन की कमी भी इस समस्या का एक प्रमुख कारण हो सकती है। आयरन न केवल खून के लिए जरूरी है, बल्कि मस्तिष्क की कार्यप्रणाली में भी अहम भूमिका निभाता है। शरीर में आयरन की कमी डोपामिन के संतुलन को प्रभावित कर सकती है। गर्भवती महिलाओं में भी यह समस्या अस्थायी रूप से दिखाई दे सकती है।
रेस्टलेस लेग्स सिंड्रोम के लक्षण अक्सर धीरे-धीरे विकसित होते हैं। शुरुआती चरण में हल्की झनझनाहट या बेचैनी महसूस होती है, जो समय के साथ बढ़ सकती है। यह समस्या मुख्य रूप से आराम करते समय, जैसे लेटने या लंबे समय तक बैठने पर अधिक प्रकट होती है।
पैरों को हिलाने या चलने से अस्थायी राहत मिलती है, लेकिन रात में यह समस्या गंभीर हो जाती है और नींद में बार-बार व्यवधान पैदा करती है। नींद पूरी न होने के कारण दिनभर थकान, चिड़चिड़ापन, ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई और मनोदशा में असंतुलन हो सकता है।
डॉक्टर आमतौर पर लक्षणों और शारीरिक परीक्षण के आधार पर रेस्टलेस लेग्स सिंड्रोम की पहचान करते हैं। खून की जांच कर आयरन का स्तर मापा जाता है। उपचार में जीवनशैली में बदलाव, नियमित व्यायाम, सोने का समय तय करना, और कुछ मामलों में दवाओं का उपयोग शामिल होता है। इसके अलावा, कैफीन का सेवन कम करना और सोने से पहले हल्का स्ट्रेचिंग करना भी इस समस्या से राहत दिलाने में मदद करता है। सही देखभाल और समय पर इलाज से इस स्थिति को नियंत्रित किया जा सकता है और नींद की गुणवत्ता बेहतर हो सकती है। (With inputs from IANS)


