गर्भासन से पाएं बेहतर पाचन और तनाव से राहत

नई दिल्ली: भारतीय परंपरा में योग को एक अमूल्य धरोहर माना जाता है, जो शरीर और मन को स्वस्थ रखने का प्राचीन माध्यम है। योग के विभिन्न आसनों में गर्भासन एक महत्वपूर्ण और प्रभावी मुद्रा है। यह हठयोग का उन्नत आसन है, जिसमें शरीर गर्भ में पल रहे शिशु जैसी आकृति धारण करता है।यह संतुलन, मानसिक शांति और पेट के स्वास्थ्य के लिए उत्कृष्ट है। यह मुख्य रूप से पेट की मांसपेशियों को मजबूत करता है, पाचन में सुधार करता है और मानसिक तनाव को कम करने में मदद करता है।
हठयोग प्रदीपिका में 15 प्रमुख आसनों का वर्णन है। यह अक्सर प्रारंभिक आसनों के समूह के बाद, उत्तान-कूर्म या अन्य बंधनों के अंतर्गत आता है। इसमें पद्मासन लगाकर हाथों को जंघाओं और पिंडलियों के बीच से निकालकर कान तक लाया जाता है।
गर्भासन 'गर्भ' और 'आसन' शब्द से मिलकर बनता है। गर्भ का मतलब 'भ्रूण' होता है और आसन का मतलब 'मुद्रा'। इस आसन को करने पर शरीर की मुद्रा ठीक वैसी ही दिखती है, जैसे मां के गर्भ में शिशु कुंडलित अवस्था में रहता है, जिस वजह से इसे गर्भासन कहा जाता है। इसको रोजाना कुछ मिनट करने मात्र से कई तरह के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य लाभ मिल सकते हैं।
आयुष मंत्रालय ने इस आसन के महत्व पर जोर दिया है। उनके अनुसार, गर्भासन एक उन्नत योग मुद्रा है जो मन को शांत करने, तनाव कम करने, पाचन में सुधार करने और एकाग्रता बढ़ाने के लिए बहुत फायदेमंद है। यह आसन शरीर का लचीलापन बढ़ाता है, जोड़ों को मजबूत करता है और पीठ के निचले हिस्से में आराम पहुंचाता है।
इसे करना बेहद आसान हैं। करने के लिए सबसे पहले योगा मैट पर पद्मासन की मुद्रा में बैठ जाएं। इसके बाद कुक्कुटासन की तरह अपने हाथों को जांघों और पिंडलियों के बीच में फंसाकर कोहनियों तक बाहर निकालें। अब दोनों कोहनियों को मोड़ते हुए हाथों से दोनों कान पकड़ने की कोशिश करें। इस दौरान शरीर का पूरा भार कूल्हों पर होना चाहिए। सामान्य रूप से सांस लेते रहें और अपनी क्षमतानुसार इस स्थिति में रहने के बाद सामान्य हो जाएं।
गंभीर पीठ दर्द, घुटने/कूल्हे की चोट या हर्निया की स्थिति में यह आसन न करें। (With inputs from IANS)


